संसार धर्म पालन : पञ्चदैवता-वेद, वेदांग, उपनिषद और 16 संस्कार॥

 


संसार धर्म का अर्थ:“संसार धर्म” से सामान्यतः तात्पर्य है परिवार या गृहस्थ जीवन से संबंधित कर्तव्य, जिम्मेदारियाँ और नैतिक आचरण। इसका पालन करने का मुख्य उद्देश्य जीवन की जिम्मेदारियाँ सही ढंग से निभाना, परिवार के सदस्यों के प्रति प्रेम और सहानुभूति दिखाना, और समाज में ईमानदारी और न्यायपूर्ण व्यवहार बनाए रखना है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि, संसार धर्म का पालन करना मतलब है “पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ स्वयं को जुड़ा रखना”।

संसार धर्म पालन के मुख्य दिशा-निर्देश:

परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाना

पिता-माता, पति/पत्नी, बच्चों के प्रति सम्मान, देखभाल और दायित्व निभाना।

परिवार के सदस्यों की सुख-शांति और कल्याण के लिए सतत प्रयास करना।

पति-पत्नी के कर्तव्य

पति और पत्नी एक-दूसरे को समान सम्मान और मर्यादा दें।

पत्नी अपने पति का सहयोग करे, गृहस्थ कार्यों में मदद करे, और पति-पत्नी दोनों अपने परिवार का पालन-पोषण और स्नेह सुनिश्चित करें।

पति, पत्नी और बच्चों के पालन-पोषण, आचरण, शिक्षा, सुरक्षा और कल्याण के लिए जिम्मेदार रहें।

सदाचार और नैतिकता

सत्य, ईमानदारी, परिश्रम और न्यायपूर्ण आचरण बनाए रखना।

अपने व्यवहार से दूसरों के लिए आदर्श प्रस्तुत करना।

परिवार में अहंकार और क्रोध को स्थान न दें, समता और शान्ति बनाए रखें।

आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारी

परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करना और ईमानदारी से जीविका अर्जित करना।

समाज में एक सच्चा और जिम्मेदार नागरिक बनकर योगदान देना।

दान, आचार्य पूजा, अतिथि सेवा आदि का पालन करना।

उदाहरण: वेद और धर्मशास्त्र में कहा गया है – “अन्नदाता सर्वदा पुण्यवान, अतिथि-सेवा ही ईश्वर सेवा के समकक्ष है।”

धर्म और आध्यात्मिकता

नियमित धर्मिक आचरण (जैसे प्रार्थना, पूजा, सत्कर्म) करना।

गृहस्थ जीवन को आध्यात्मिक मूल्यों के साथ जोड़ना।

*तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार, गृहस्थ जीवन में धर्म का पालन मोक्ष मार्ग का सहायक है।

तैत्तिरीय उपनिषद् (I.11.1) -

"ऋणान्यनवृत्त्य गृहस्थः, धर्मान्सर्वान्संपादयेत्। धर्मस्य तु मोक्ष प्राप्ति हेतुता।"

अभिप्राय: गृहस्थ को अपने सभी कर्तव्य धर्मपूर्वक निभाने चाहिए, जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

सद्गुण और नैतिकता

सत्यवचन, सहिष्णुता, अहिंसा और परिश्रम का अभ्यास करना।

गृहस्थ जीवन में अहंकार, क्रोध, मोह या लोभ के लिए कोई स्थान न होना चाहिए।

भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण संस्थितः।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स श्रीभगवान् स्मृतः॥

भगवान

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण।

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्म स हि कथ्यते श्रीभगवान्॥

भगवतत्त्वविवेचनम्

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्थितः स्वातन्त्र्येण,

स एव परमात्मा पूर्णब्रह्मेति कथ्यते भगवान्॥


यः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् जगतः कारणं नियन्ता च,

स ईश्वरः स एव भगवान् परमब्रह्मादिदेवः सर्वेश्वरः॥

सत्यः

यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा परं ब्रह्म भगवान् हि सत्यम्॥

सत्यः

यः स्वयं-संपूर्णः स्वयं-सिद्धः स्वातन्त्र्येण स्थितः,

स एव परमात्मा पूर्ण-ब्रह्म स एव भगवान् हि सत्यम्॥

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सनातनधर्मस्य प्रथमः सोपानः

(The First Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं सत्पुरुषो भव, ततः सर्वकर्माण्याचर।

कामक्रोधलोभवर्जितः, दयामार्गे सदा स्थितः॥


हत्याहिंसाविनिर्मुक्तः, धर्ममार्गे दृढस्थितः।

लोकहिते सदा युक्तः, सत्ये नित्यं प्रतिष्ठितः॥


दयाशीलसमायुक्तः, न्यायमार्गे व्यवस्थितः।

एषः सनातनधर्मस्य, प्रथमः सोपानः स्मृतः॥

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सनातनधर्मस्य द्वितीयः सोपानः

(The Second Step of Sanatana Dharma)

प्रथमं निष्कामकर्म स्यात्, द्वितीयं तत्त्वज्ञानार्जनम्।

तृतीयो भक्तियोगश्च, चतुर्थं आत्मप्रकाशकम्॥


कर्मयोगेन चित्तशुद्धिः, ज्ञानयोगेन ज्ञानार्जनम्।

भक्तियोगेन भक्तिप्राप्तिः, जीवहिते श्रेष्ठा गतिः॥


सर्वे मार्गाः लक्ष्यन्ते, लभ्यते मोक्षः स्यात्।

एषः सनातनधर्मस्य, द्वितीयः सोपानः स्मृतः॥

कर्मधर्मद्विपक्षेण जीवस्य गतिः

[ईश्वरप्राप्त्युपायः]

(मुक्तछन्दः)


यथा पक्षी द्वाभ्यां पक्षाभ्यां गच्छत्यन्यं स्थलम्।

तद्वज्जीवः कर्मधर्माभ्यां गच्छत्यन्यं जीवनपथम्॥


यथा ज्ञानबलात् पक्षी दृढविश्वाससंयुतः।

प्राप्नोति स्वप्रियं स्थानं निश्चलधिया युतः॥


तथा जीवः निष्कामकर्मधर्मपरायणः।

ज्ञानयोगेन संयुक्तः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः॥


प्रेमभक्त्यानुसेवया प्राप्नोति परमं पदम्।

परमानन्दमाप्नोति ईश्वरस्य दिव्यं धाम॥

हरेर्मायानिवारणस्य साधनम्।

मनुष्यलोके हरेर्माया व्याप्ता सर्वत्र संस्थिता।

केवलं हरेः कृपादृष्ट्या परिहारः सम्भवः तस्याः॥


मोहिनी सा नयति एनं दुःखसंसारसागरम्।

हरेः स्मरणमात्रेण नश्यति सा स्वप्नसन्निभा॥

विवाहनीतिः

(मुक्त छंद)

एकविवाहः श्रेष्ठः स्यात् लोके धर्मपरायणः।

सुखदः शान्तिदः नित्यं जीवनस्य हितावहः॥ 


धर्मरक्षार्थमेवात्र बहुविवाहः कदाचन।

अन्यथा स दुःखदः स्यात् सदा क्लेशवृद्धिकरः॥


एकविवाहे सन्तोषः भार्यापत्यसमन्वितः।

शान्तिः प्रेम च नित्यं स्यात् हृदये सुखवर्धितः॥ 


बहूनामेकगृहस्थे विवादः स्यादनिवारितः।

कलहः क्लेशदः नित्यं जीवनं दुःखवर्धितम्॥ 


तस्मादेकविवाहोऽयं श्रेयस्करः बुधैः स्मृतः।

बहुविवाहो लोकेऽस्मिन् दुःखहेतुः प्रकीर्तितः॥

परस्त्री-कन्यालङ्घनदोषः

परस्त्रीगर्भधारणं महापापप्रदायकम्।

नियोगसंयोगप्रथा भ्रष्टाचारस्य कारणम्॥

कुमार्या सह सङ्गं तत् पापहेतुप्रदायकम्।

सृष्टेः संसारहेतूनां महाअहितकरं ध्रुवम्॥

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धर्मपूर्वकं प्रजननम्।

(मुक्तछन्दः)

प्रजननं सर्वभूतानां धर्मः शास्त्रोक्तम् अनुशासनम्।

पोषणसामर्थ्यं मनसि कृत्वा ततः कुर्यात् प्रजननम्॥

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योनिस्वयंवरनियमः

(प्रकृतिस्वयंवरसत्यं)

(मुक्तछन्दः)

प्रत्येकस्यां योनौ विद्यते स्वयमेव स्वयंवरसभा।

तत्र स्वयं प्रकाशते, ईश्वरदत्ता योनिप्रभा॥


एष प्रकृतेर्मूलं सत्यं परमः नियमः।

सर्वयुगेषु सर्वकाले सत्यरूपेण विद्यमानः॥


एष धर्मः प्रकृतेर्नित्यः स्वयंसिद्धः सनातनः।

सर्वकालेषु सत्योऽयं, न कदाचिद् विपर्ययः॥

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जन्ममृत्युः (सत्यम्–मिथ्या)

(मुक्तछन्दः)

जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं पूर्णतया मिथ्या।

मरणानन्तरं सः जानाति लोकेऽस्मिन् सत्यम्॥


जीवस्य लोकेऽस्मिन् जीवनं केवलं स्वप्नम्।

मरणानन्तरं तत् भवति जाग्रतावस्थायां स्थितम्॥


तस्मात् जीवने सदा कर्तव्यं सदाचारं च सत्कर्म॥

अन्यथा मरणानन्तरं प्राप्नोति महद्दुःखकष्टम्॥

सत्यस्य मौनम् 

(पृथिव्याः यथार्थता)

(मुक्तछन्दः)


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, न कश्चित् सत्यमिच्छति।

सर्वे वक्तुमिच्छन्ति, स्वकथां स्वनाम च॥


न कश्चित् श्रोतुमिच्छति, सर्वे मानगर्विताः।

स्वार्थे मग्नाः जनाः सर्वे, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


आपदि सम्प्राप्तायां तु, सत्यं ज्ञातुमिच्छन्ति।

पूर्वं तु न कश्चिदेव, कदाचन तत्त्वं वेत्ति॥


सर्वे यशःप्रचारेण, स्वनाम विस्तारयन्ति।

सत्यं तु नाङ्गीकुर्वन्ति, परवाक्यं न शृण्वन्ति॥


सत्यं तिष्ठति मौनेन, गर्वेणावृतचेतसाम्।

एषा लोके कठोरेव, पृथिव्याः यथार्थता॥


यः शुद्धात्मा स एवैतत्, जन्मनैव वेत्ति हि।

अन्ये मोहान्धचेतसः, न जानन्ति एव हि॥ 

पूजा

यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।

सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥

शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः

(मुक्तछन्दः)

शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं च आनन्दवर्धकम्।

अधर्मशोकभीतानां, तमसां च विनाशकम्॥


शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।

विष्णोः पूजाविधौ पुण्यं पापनाशनम् उत्तमम्॥


न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।

शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥

शङ्खनिनादः शङ्खध्वनिः

(मुक्तछन्दः)

शङ्खनिनादः परं पवित्रं, शुभदं चानन्दवर्धकम्।

अधर्मशोकभीतानां तमसां च विनाशकम्॥


शङ्खध्वनिः शुभो भवतु, नरनार्योः सम्मिलनम्।

विष्णुपूजाविधौ पुण्यं पापनाशनमुत्तमम्॥


न स्त्री न च नरः भेदः धर्मे सत्ये च कर्मणि।

शङ्खध्वनिः सदा कार्यः नारायणप्रेमणि॥

शङ्खनादमहिमा।

(मुक्तछन्दः)

उद्घोषोऽयं शङ्खनादस्य दैविको पुण्यवर्धनः।

नारायणस्य प्रीत्यर्थम् उद्घोषयेत् शङ्खनादम्॥


नास्ति धर्मे स्त्रीपुंसोर्भेदभावः कदाचन।

सर्वे समत्वभावेन कुर्वन्तु शङ्खनादम्॥

चतुर्व्यूह‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः

ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे

तुलसीपवित्रं धीमहि।

तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥

शुद्धस्वरूप‑ब्रह्म‑गायत्री‑मन्त्रः

(ब्रह्म-गायत्री-मन्त्रः)

ॐ चतुर्व्यूहरूपं विद्महे

शुद्धस्वरूपं धीमहि।

तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात्॥

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पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्

जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।

परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि प्रथमम्॥


एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।

ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥

अज्ञानिनां मिथ्याप्रचारः
(ब्रह्मतत्त्वे अज्ञानम्)
अज्ञानी मूर्खा न जानन्ति श्रीबलभद्रम्।
श्रीशेषनागं बलभद्रनाम्ना कुर्वन्ति वर्णनम्॥

ते श्रीप्रद्युम्नं च श्रीअनिरुद्धं च न जानन्ति।
महाज्ञानी इति स्वयम् लोके प्रचारयन्ति॥

अज्ञानं ब्रह्मतत्त्वे, अज्ञानं सिद्धियोगशास्त्रे।
मिथ्याज्ञानं ते लोकेऽस्मिन् प्रचारयन्ति गुरुरूपे॥

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अर्थ: जगन्नाथ, बलभद्र, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध और परमात्तिका प्रकृति - ये पाँच देवता इस सृष्टि के मुख्य पंचदेवता माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक ग्रह और प्रत्येक गृह में भी पाँच-५ देवता होते हैं। ये देवता अपने-अपने स्थान पर कार्यरत रहते हैं और उन्हें उनके स्वस्थान के पंचदेवता कहा जाता है।

हिन्दू धर्म में 16 संस्कारों (षोडश संस्कार)।

 ये संस्कार जीवन के विभिन्न चरणों में आयोजित किए जाते हैं और व्यक्ति के जीवन में शुद्धता, धार्मिकता और सामाजिक जिम्मेदारियों को महत्व देते हैं। यहाँ प्रत्येक संस्कार का संक्षेप में विवरण दिया गया है:

गर्भाधान संस्कार: संतान की प्राप्ति के लिए प्रजनन की प्रक्रिया को पवित्र करने का संस्कार।

पुंसवन संस्कार: गर्भावस्था के दौरान, गर्भ के स्वस्थ विकास के लिए किया जाने वाला संस्कार।

सीमन्तोन्नयन संस्कार: गर्भवती महिला के स्वास्थ्य और सुरक्षित प्रसव के लिए किया जाने वाला संस्कार।

जातकर्म संस्कार: जन्म के तुरंत बाद नवजात शिशु का स्वागत करने और स्वास्थ्य के लिए किया जाने वाला संस्कार।

नामकरण संस्कार: बच्चे का नामकरण करने का संस्कार।

निष्क्रमण संस्कार: बच्चे को पहली बार घर से बाहर ले जाने का संस्कार।

अन्नप्राशन संस्कार: बच्चे को पहली बार अन्न (ठोस भोजन) खिलाने का संस्कार।

चूड़ाकर्म संस्कार: बच्चे के बाल काटने का प्रथम संस्कार।

विद्यारम्भ संस्कार: बच्चे की शिक्षा की शुरुआत का संस्कार।

कर्णवेध संस्कार: बच्चे के कान छिदवाने का संस्कार।

यज्ञोपवीत संस्कार: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण के लड़कों का उपनयन (यज्ञोपवीत धारण) संस्कार।

वेदारम्भ संस्कार: वेदों का अध्ययन शुरू करने का संस्कार।

केशान्त संस्कार: शिक्षा पूर्ण होने पर बाल कटवाने का संस्कार।

समावर्तन संस्कार: गुरुकुल से शिक्षा पूरी करने के बाद गृहस्थ जीवन की शुरुआत का संस्कार।

विवाह संस्कार: विवाह का पवित्र अनुष्ठान।

अंत्येष्टि संस्कार: मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार।

ये संस्कार व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक और सामाजिक मूल्यों को सुदृढ़ करते हैं और परिवार तथा समाज में उनकी भूमिका को सुनिश्चित करते हैं।

वेद, वेदांग, उपनिषद ॥

Vedas, Vedangas and Upanishads;-

(वेद एवं उपनिषद):-

वेद का शाब्दिक अर्थ 'ज्ञान' है।

वेद के  चार भाग है: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। 

चतुर्वेद' के रूप में ज्ञात इन ग्रंथों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार हैं :-

चतुर्वेद भारतीय धर्म के प्राचीन साहित्य के महत्वपूर्ण भाग हैं। इन्हें वेदों के नाम से भी जाना जाता है। चतुर्वेद चार प्रमुख वेद हैं: ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद। 

ऋग्वेद: ऋग्वेद सबसे पुराना और प्राचीन वेद है। इसमें ब्राह्मण ग्रंथ और आरण्यक भी हैं। ऋग्वेद में मुख्यतः देवताओं की स्तुति और उनकी महत्ता का वर्णन है। यजुर्वेद: यजुर्वेद में यज्ञ के रीति-रिवाज और मंत्र हैं। यज्ञों को करने की विधियाँ इसमें विस्तार से दी गई हैं। सामवेद: सामवेद का मुख्य उद्देश्य गायन के लिए है। इसमें विभिन्न मंत्रों को सामगान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अथर्ववेद: अथर्ववेद में भूतभविष्य के विषय में मंत्र हैं, साथ ही यह चिकित्सा, वास्तु, ज्योतिष, और शिक्षा के सिद्धांतों को भी संज्ञान में लेता है। चतुर्वेदों का अध्ययन ध्यानपूर्वक किया जाता है और इन्हें हिंदू धर्म की प्राचीनतम और प्रमुख प्रामाणिक ग्रंथों में से एक माना जाता है।

श्रीमद् भागवत महापुराण ,महाभारत के अनुसार  वेदों का विभाजन करने के कारण वे वेदव्यास के नाम से विख्यात हुये।

1.ऋग्वेद - सबसे प्राचीन तथा प्रथम वेद जिसमें मन्त्रों की संख्या 10462,मंडल की संख्या 10 तथा सूक्त की संख्या 1028 है। ऐसा भी माना जाता है कि इस वेद में सभी मंत्रों के अक्षरों की संख्या 432000 है। इसका मूल विषय ज्ञान है। 

2.यजुर्वेद - इसमें कार्य (क्रिया) व यज्ञ (समर्पण) की प्रक्रिया के लिये 1975 मन्त्र हैं। 

3.सामवेद - इस वेद का प्रमुख विषय उपासना है। संगीत में लगे शूर को गाने के लिये 1875 संगीतमय मंत्र।

4.अथर्ववेद - इसमें गुण, धर्म, आरोग्य, एवं यज्ञ के लिये 5977  मन्त्र हैं।


चतुर्वेदानां विषयवस्तुः।

सृष्टे रहस्यं विमलं च तत्त्वं,ऋग्वेदवाणी प्रथमे प्रबोधा।

यज्ञक्रमाणां विधानदाता,यजुर्वेद एष मधुरः स्वरात्मा॥

स्तोत्रात्मकः देवस्य गीतैः प्रहवः मनोज्ञः, सामगतो गुणाढ्यः ।

शान्तिप्रदः सौम्यविधिप्रकाशी,वेदश्चतुर्थोऽथर्वणो निरामयः॥

शिशुवेदः।

ऋग्यजुःसामथर्ववेदाः एते सर्वे कर्मज्ञानप्रधानाः।  

चतुर्वेदेभ्यश्च एष शिशुवेदः स्वयं केवलं भावप्रधानः॥


अस्य प्रवक्ता परब्रह्म श्रीजगन्नाथः, श्रोता श्रीबलभद्रः।  

अत्र नास्ति भेदविचारः, भक्तः भगवान् च समानौ॥

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चतुर्वेद को पढ़ाने के लिए छः अंगों (वेदांग)- शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष के अध्ययन और उपांगों जिनमें छः शास्त्र - पूर्वमीमांसा/मीमांसा शास्त्र/, वैशेषिक शास्त्र, न्याय शास्त्र, योग शास्त्र, सांख्य शास्त्र और वेदांत शास्त्र व दस उपनिषद् -

1. इशा/इशावास्य (शुक्ल यजुर्वेद )।

2. केन/केनोपनिषद (सामवेद)।

3. कठ/कठोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद)।

4.प्रश्न /प्रश्नोपनिषद (अथर्ववेद)।

5.मुण्डक/मुंडकोपनिषद् (अथर्ववेद)।

6. मांडुक्य/माण्डूक्योपनिषद (अथर्ववेद)।

7.ऐतरेय/ऐतरेयोपनिषद् (ऋग्वेद)।

 8.तैतिरेय/तैत्तिरीयोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद)।

9.छान्दोग्य उपनिषद् (सामवेद)। 

10. बृहदारण्यक उपनिषद् (शुक्ल यजुर्वेद )। 

 के अध्ययन की जरूरत होती हैं। प्राचीन समय में इनको पढ़ने के बाद वेदों को पढ़ा जाता था।

💥[उपनिषद् की संख्या लगभग १०८ (108) है, किन्तु मुख्य उपनिषद १३ (13) हैं। हर एक उपनिषद किसी न किसी वेद से जुड़ा हुआ है। इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह्म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन दिया गया है। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने १० (10) उपनिषद् पर अपना भाष्य दिया है-(१) इशा (२) ऐतरेय (३) कठ (४) केन (५) छान्दोग्य (६) प्रश्न (७) तैत्तिरीय (८) बृहदारण्यक (९) मांडूक्य और (१०) मुण्डक। उन्होने निम्न तीन उपनिषद् को प्रमाण कोटि में रखा है-(1) श्वेताश्वतर (कृष्ण यजुर्वेद) (2) कौषीतकि (ऋग्वेद)  (3) मैत्रायणी (सामवेद)।]💥 


वेदांग-वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को ही वेदांग कहा जाता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त - ये छः वेदांग है


1.शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहाजाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है।


2.कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र। कल्प वेद-प्रतिपादित कर्मों का भलीभाँति विचार प्रस्तुत करने वाला शास्त्र है। इसमें यज्ञ सम्बन्धी नियम दिये गये हैं।


3.व्याकरण - इससे प्रकृति और प्रत्यय आदि के योग से शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध होता है। वेद-शास्त्रों का प्रयोजन जानने तथा शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके अतः इसका अध्ययन आवश्यक होता है। इस सम्बन्ध में पाणिनीय व्याकरण ही वेदांग का प्रतिनिधित्व करता है। व्याकरण वेदों का मुख भी कहा जाता है।


4.निरुक्त - वेदों में जिन शब्दों का प्रयोग जिन-जिन अर्थों में किया गया है, उनके उन-उन अर्थों का निश्चयात्मक रूप से उल्लेख निरूक्त में किया गया है। इसे वेद पुरुष का कान कहा गया है। निःशेषरूप से जो कथित हो, वह निरुक्त है। इसे वेद की आत्मा भी कहा गया है।


5.ज्योतिष - इससे वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का समय ज्ञात होता है। यहाँ ज्योतिष से मतलब `वेदांग ज्योतिष´ से है। यह वेद पूरुष का नेत्र माना जाता है। वेद यज्ञकर्म में प्रवृत होते हैं और यज्ञ काल के आश्रित होते है तथा जयोतिष शास्त्र से काल का ज्ञान होता है। अनेक वेदिक पहेलियों का भी ज्ञान बिना ज्योतिष के नहीं हो सकता।


6.छन्द - वेदों में प्रयुक्त गायत्री, उष्णिक आदि छन्दों की रचना का ज्ञान छन्दशास्त्र से होता है। इसे वेद पुरुष का पैर कहा गया है। ये छन्द वेदों के आवरण है। छन्द नियताक्षर वाले होते हैं। इसका उदेश्य वैदिक मन्त्रों के समुचित पाठ की सुरक्षा भी है।


छन्द को वेदों का पाद, कल्प को हाथ, ज्योतिष को नेत्र, निरुक्त को कान, शिक्षा को नाक, व्याकरण को मुख कहा गया है।ये सोलह संस्कार हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण अनुष्ठान और रीति-रिवाज हैं।

Knowledge Through Poetry (Especially in Sanskrit)

Poetry makes knowledge last. Verse is easy to remember and simple to transmit, even without writing. In the Sanskrit tradition, wisdom was preserved orally for centuries, carried faithfully through sound and memory. In Sanskrit especially, the power of sandhi allows sounds and meanings to unite within a single, flowing expression. Words do not stand isolated; they merge, resonate, and create a living current of meaning. Poetry enters the heart through rhythm and resonance. No script is required-the Sanskrit word itself, woven through sandhi, shines complete and self-contained. It can travel intact from one heart to another. Even in times of destruction, when manuscripts are lost and structures fall, poetry safeguards knowledge. Memory becomes the temple, sound becomes the scripture, and the living voice becomes the preserver of truth.

Thus, poetry is not merely ornamentation-it is a powerful vessel for holding, protecting, and disseminating knowledge across generations.


सत्योपासना
पूजायां नास्ति समयो, न घंटानिनदः आवश्यकः।
न मन्त्रजपो न बाह्यकृत्यं, भाव एव आवश्यकः॥ 

न पश्यति भगवान् द्रव्यं, न हेमावरणभूषणम्।
हृद्गूढभक्तिमेव पश्येत्, शुद्धमानसपूजनम्॥

भक्त–भगवान्–भावः
भक्तः महाभावग्राही, भगवान् च तथैव सदा।
प्रेमसम्बन्धो महाभावः, स एव तयोः सदा॥

 सत्योपासना 
पूजायां नास्ति कालोऽत्र, न घंटानिनदः आवश्यकः।
न मन्त्रजपो न बाह्यक्रिया, भाव एव ह्यावश्यकः॥

न पश्यति भगवान् द्रव्यं, न हेमावरणभूषणम्।
हृद्गूढभक्तिमेव पश्येत्, शुद्धभावप्रपूजनम्॥ 
भगवदवतारवर्णनम्
भगवतोऽवतारा बहुधा प्रकीर्तिताः,
धर्मसंस्थापनार्थं लोकेऽवतारिताः॥
तेषां तत्त्वरहस्यं गूढं न सुलभं बोधितुम्,
भक्त्या तु दिव्यतत्त्वं हृदि स्फुरति नित्यम्॥

चतुर्व्यूहेषु रूपेषु वासुदेवः परः स्मृतः,
संकर्षणः प्रद्युम्नोऽनिरुद्धश्च अंशावताराः॥
एते हि व्यूहभेदाः दिव्यरूपप्रकाशकाः,
भगवतः स्वरूपस्य भिन्नांशाः प्रकाशकाः॥
तेषामप्यंशरूपाणि लोके विभान्ति नित्यम्,
तानि भगवतः शक्त्या विश्वं बिभ्रति सततम्॥

अन्ये तु गुणावतारा जगति विख्याताः,
सत्त्वादिगुणभेदेन रूपाणि विभ्रताः॥
तेषामपि स्वरूपाणि लोके विभान्ति हि,
लीलया भगवान् विश्वं नित्यं बिभर्ति हि॥
भगवत्प्रसन्नता
(मुक्तछन्दः)
यः भक्तः स्तौति भगवतः चतुर्व्यूहरूपम्,
तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा अत्यन्तम्॥

यः भक्तः स्तौति पार्श्वदेवतानां समरूपम्,
तस्मै भगवान् भवति प्रसन्नः सदा सर्वाधिकम्॥

एतदेव हि परमं सत्यं नित्यम्,
सर्वयुगेषु सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्॥

सर्वकालेष्वपरिवर्तनीयम्=सर्व+ कालेषु + अपरिवर्तनीयम्
अवतारागमन-प्रस्थानस्य गूढत्वम्।
जगन्नाथ एव स्वकं जानात्यवतारसमागतम्।
मर्त्यलोकात् प्रस्थानं तस्यैवास्ति सुबोधितम्॥

न ब्रह्मा न च वेदाश्च न देवासुरमानवाः।
केवलमनुमानेन महिमा तस्य अनुभव्यते॥

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सत्य–मिथ्या
(मुक्तछन्दः)
असत्यतन्तुभिर्वस्त्रं क्षणमात्रं विराजते ।
छायामूलसमुत्पन्नं स्वयमेव विनश्यति ॥

मिथ्याज्ञानविनिर्मितं शिक्षणं शोभनं भवेत् ।
हृदयशून्यमन्तस्तु तत्त्वतः न प्रकाशते ॥

यः नृपः स्वासनं कृत्वा मिथ्यावाक्यनिबन्धनम् ।
कालाग्निना स दह्येत सह राज्येन मण्डनम् ॥

मिथ्याप्रतिष्ठितं राज्यं घोषध्वनिभिरुज्ज्वलम् ।
अन्तर्भिन्नाधारत्वात् पतत्येव न संशयः ॥

सत्यतन्तुभिराच्छन्नं वस्त्रं नित्यं विराजते ।
न वह्निना न वातेन कदाचन विनश्यते ॥

शनैः शनैः चरन् सत्यं शान्तिदं लोकजीवने ।
तमोभेदकरं नित्यं  रविरिव प्रभाते ॥

तस्मात् सत्येन जीवनं कर्तव्यं शुद्धचेतसा ।
सत्यनिर्मितजीवनं तिष्ठति शान्तिसम्पदा ॥
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जगत्-संसार
जगत् सत्यं नित्यं च,तस्य परिवर्तनम् ईश्वराधीनम्।
संसारोऽपि दिव्यात्मकः मायाबद्धः सदा क्षणम्॥

स्वकर्मकामनाः सर्वाः दोषिण्यः नित्यमशुद्धम्।
निष्कामकर्म योग्यं तु शुद्धतमं परं स्मृतम्॥

जीवः कर्मार्थधर्मैश्च गृह्णात्यनेकम् ऋणं सततम्।
अन्ते तस्य परिशोधनं कर्तव्यं ज्ञात्वा कुरु कार्यम्॥

धर्मः
(मुक्तछन्दः)
ईश्वरस्य उचितादेशपालनम्,
तस्य नीतिनियमानां अनुसरणम्।
जागतिकानां सुनियमधारणमेव धर्मः॥
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उचितादेशपालनम् - तात्पर्यम्
ईश्वरस्य आदेशः अन्ततः धर्ममयः अस्ति।
कदाचित् सः भक्तपरीक्षारूपेण प्रतीयते।
श्रद्धा-विवेक-धर्मबुद्ध्या तस्य पालनमेव सच्चधर्मः।
एवं धर्मः जगतः स्थिरतां दधाति॥

धर्मलक्षणम्।  
यः स्वयंसत्यः स्वयंसम्पूर्णः स्वयंसिद्धो निरामयः।  
स्वातन्त्र्येण स्थितः नित्यात्मा धारयितुं स योग्यः॥

यः सत्यं धृतिं दमं क्षमां संयममेव च।
शास्त्रज्ञानुसारं तत् प्रोक्तं धर्मलक्षणम्॥
अध्ययन-प्रचार-अध्यापन
अधिकारनीतिः
(मुक्तछन्दः)
सर्वेऽपि शास्त्रं पठितुं समर्हाः,
न जातिभेदो न च लिङ्गवर्जाः।
न जन्मना कश्चन वर्जनीयः,
सत्यस्य मार्गेऽधिकारयोग्यः॥

यो बोधयेद् अन्यजनं हि सम्यक्,
तस्यास्ति ज्ञानं यदि सुसम्यक्।
अज्ञानयुक्ता कथिता हि वाचः,
नयन्ति लोकान् विपथं भ्रंशम्॥

तस्मात् सनातनधर्मोऽयं ब्रूते,
न सर्व एवोपदिशन्ति शास्त्रे।
येषां तु ज्ञानं विशदं विमुक्तं,
ते एव लोकाय प्रदिशन्ति मार्गम्॥
शास्त्रार्थबोधयोग्यता
शास्त्रार्थबोधाय विवेकयुक्ता
सूक्ष्मा बुद्धिर्विज्ञानयुक्ता ।
युक्तिप्रधाना प्रबुद्धा बुद्धिः
तद्विना न सिद्ध्येत् गूढार्थगतिः॥
शास्त्राध्ययननीति।
गुरुपादाम्बुजयोगेन शास्त्रमध्येत न संशयः।
यथा प्रदीप्तदीपः तमो नाशयति तत्त्वतः॥
निहत्य मोहजालं गुरुः सत्यं तत्र न संशयः।
शास्त्रार्थसमीक्षया तेन मोक्षमार्गः प्रसस्तय॥
ज्ञानदाननीतिः - नियमः
(मुक्तछन्दः)
यो यावद् ज्ञानधारणसमर्थः स्यात्,
तस्य तावत् ज्ञानं स्वाभाविकं भवेत्।

यो यदा यावत् ज्ञानलाभयोगः स्यात्,
तस्मै तु ज्ञानदानमेव कर्तव्यम् सदैव॥

भिन्नोऽयं व्यवहारः सदाऽपि परिहर्तव्यः,
अनिष्टफलत्वात् स परिगृहीतः परिहर्तव्यः।

यः सदा ज्ञानकामः प्रणतः समर्थः प्रयत्नवान्,
तस्मैव ज्ञानं देयं नान्यस्मै कदाचन॥

एष नूनं संसारस्य नित्यो नियमः।
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धर्मः - सनातनसत्यं
(मुक्तछन्दः)
धर्मः सत्यं सनातनं, विश्वव्यापी निरामयः ।
न कालबद्धो न देशबद्धः, नित्यशुद्धो निरामयः ॥

न स्वार्थसिद्ध्यर्थं वाच्यः, न लोभेनोपपादितः ।
विशालः शाश्वतः सत्यः, नित्यं धर्मः प्रतिष्ठितः ॥

अनन्तो व्यापकः शान्तः, सर्वलोकैकबान्धवः ।
न जातिभेदेन सीमितः, सर्वजीवैकबान्धवः ॥

यो धर्मं रक्षति नित्यं, आचरन् अविचलितः ।
धर्मो रक्षति तं नित्यं, सत्यधर्मेण पालितः ॥
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धर्मसंस्थापनाय श्री जगन्नाथः
यदा मिथ्याचारिणो धूर्ता दुष्टचारित्रधारिणः ।
सन्तवेषधराः लोके कुर्वन्त्यधर्मसञ्चयम् ॥

राजानः साधवश्चापि मौनं धारयन्ति चेत् ।
तदा वर्धतेऽधर्मो हि सत्यधर्मविघातकः ॥

तदा स्वयं जगन्नाथः कालरूपेण तिष्ठति ।
दुष्टानां निग्रहं कृत्वा धर्मसंस्थापनं करोति ॥

एष धर्मस्य नित्यः नियमः सर्वयुगेषु हि ।
सत्यमेव जयत्यन्ते दैवनीतिः प्रसीदति ॥
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भक्तरक्षणं धर्मोपदेशः
(मुक्तछन्दः)
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सनातनं वचनम्।
भक्तात्मनः विपदि तस्य सह कुरु अवस्थानम्।
सान्त्वनां प्रदेहि सदा, न त्यज एनं एकाकिनम्।
निन्दकदुष्टानां कुरु उचितं प्रत्युत्तरम्।
भक्तात्मनः विपदि तं मा त्यज कदाचन।
ब्रह्मादेशं मन्यस्व, तस्य सदा कुरु पालनम्॥
भक्तभगवतोः इह लीला
भक्तः सदा सहनशीलः सदा सामाजिकः।
भक्तरक्षकः भगवान् न भवति अशास्त्रिकः।

भक्तधर्मरक्षणार्थं करोति असुरसंहारम्।
भगवतः एतत् इह दैवकर्म सदा अनन्तम्॥
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स्वप्न-अनुभूति-विवेचनम्
शृणुत भक्तगणाः एतद् सनातन वचनम्।
स्वप्नः अनुभूतिश्च द्वयं अनिश्चितदर्शनम्।।
अप्रामाणिके भवति द्वयं महाविध्वंसकम्॥
प्रामाणिके भवति द्वयं परमसुखप्रदम्॥
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सूक्ष्म-स्थूलदेह-विवेचनम्।
पञ्चभूतेन निर्मितं स्थूलं देहमिदं ध्रुवम्।
मनः बुद्धिः पञ्चप्राणाश्च पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि च॥
पञ्च कर्मेन्द्रियैः सह संयुक्तं सूक्ष्मशरीरं भवेत्।
एतत् सूक्ष्मशरीरं आत्मनः निवासस्थानं ध्रुवम्॥
स्वप्न-मरण-आत्मतत्त्वम्
(मुक्तछन्दः)

यदा निर्गच्छत्यात्मा देहात् न कश्चिद् वेद तदा।
न कम्पः नापि चिह्नः स्यात् शान्ते देहे स्थिते सदा॥

निशब्दं याति दूरं स यत्र प्राणो न गच्छति।
अदृष्टोऽज्ञातमार्गेण मृत्यु-पन्थानमृच्छति॥

पुनर्यदा प्रविशत्येष देहं मृत्तिकामयं पुनः।
तदा वेदना समुत्पन्ना चेतना जायते निश्चितः॥

स्पन्दते जागरूकं देहं जीवनं स्वं प्रपद्यते।
वेदना सूचयत्येव आत्मनः सन्निधिं ध्रुवम्॥

अतः मूढमिदं मनो न सर्वं सत्यमीक्षते।
स्वप्नमायाविलासेन भ्रान्तिमेव प्रसूयते॥

विवेकेन विचिन्त्यैतत् सत्यं मिथ्यां च भेदय।
क्षणभङ्गुरेऽस्मिन् लोके आत्मयात्रां निरीक्षय॥
मृत्युः - वास्तविकः मृत्युः।
जीवस्य जन्ममरणं भवति वारं वारम्।
तानि सर्वाणि मरणानि असत्यं अनित्यं।
यदा ज्ञानी पुण्यात्मनः सम्मानः नश्यति वारं वारम्।
तदा तस्य भवति पूर्णं मरणं, जीवनम् असारम्।
जीवनमृत्यु-दर्शनम्
मरणं एव अन्तः इत्यत्र पूर्णतया मिथ्या।
मरणानन्तरम् आरभते नूतना पुनर्नवयात्रा।
एतत् सनातनधर्मस्य तत्त्वं न स्यात् कदापि मिथ्या।
यः एतत् न जानाति तं प्राप्नुवन्ति दुःखक्लेशवेदनापीडाः॥
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मोक्षतत्त्वम्।
मुक्त -छन्दः (Devanagari)
येन तत्त्वेन जीवोऽयं प्राक् सृष्टो मूलकारणात् ।
तत् तत्त्वं ज्ञात्वा निर्लेपं मनः कृत्वा समर्पयेत् ॥
अधिष्ठाते समर्पे स्यात् स सत्यः शुद्धमोक्षदः ।
अनादिबन्धनच्छेदो विमुक्तिः परमं सुखम् ॥
सर्वेषां ऋणानां  परिशोधनमप्यावश्यकम् ॥
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कर्मतत्त्वम्
पापविनाशेन जीवः लभते स्वर्गसुखम्।
पुण्यक्षये जीवोऽनुभवति मृत्युदुःखम्॥

सत्कर्मभिः साध्यन्ते जीवनसुखसम्पदः।
असत्कर्मभिर्नश्यन्ति सर्वसुखसाधनाः॥

जीवस्य पापं पुण्यं च द्वे मुख्ये तत्त्वे स्तः।
यौ प्राणिनः सुखदुःखसमृद्धिगती प्रददतः॥
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सती-आदर्श-नारी-चरित्रम्
सती नारी सदा शुद्धा, आदर्शा च सुसंयता।
परपुरुषसङ्गं त्यक्त्वा, वर्तते सा पतिव्रता॥

अन्यायपापसङ्गं त्यक्त्वा, धर्ममार्गे सदा स्थिता।
गृहे प्रिया समाजेषु, सर्वत्र सा सुपूजिता॥
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दुर्गुणजन-दूरस्थापन-महत्त्वम्
(दुष्टसंगति-त्यागः)

दुष्टा गौः श्रेयसी नैव, शून्या चेत् गोशला वरम्।
पापिनः सद्भवात् तस्मात्, अभावोऽपि सदा वरः॥

यथा नागं विषोल्बणं गृहे नैव निवासयेत्।
तथा दुष्टजनात् नित्यं दूरमेव समाश्रयेत्॥
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षड्रिपुणां प्रभावः
(पतनोत्थानद्वयम्)
कामात् क्रोधो भवेद् मोहः, मोहाद् लोभोऽभिजायते।
लोभाद् मदो मत्सरश्च, पतनस्य क्रमः प्रवर्तते॥

दमात् शान्तिर्भवेद् बुद्धिः, बुद्धेर्धर्मोऽभिजायते।
धर्माद् विनयः प्रीतिश्च, उत्थानस्य क्रमः वर्तते॥
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षड्दोषनाशकनीतिसूक्तयः
१. दारिद्र्यदोषः

(दारिद्र्यदोषः कामनां सृजति अन्यत्र।)
दारिद्र्येण कुलं विनश्यति, दारिद्र्यात् लज्जा विनश्यति।
लज्जानष्टे धर्मो नश्यति, धर्मे नष्टे सर्वं नश्यति॥

२. क्रोधदोषः

क्रोधात् बुद्धिर्विनश्यति, क्रोधात् धैर्यं विनश्यति।
बुद्धिनाशे कार्यनाशः, धैर्ये नष्टे फलं नश्यति॥

३. मोहदोषः

मोहो मूलं सर्वदुःखानां, मोहात् बुद्धिर्विनश्यति।
बुद्धिनाशे विवेको नश्यति, विवेकाभावे पतत्यधः॥
ज्ञानात् तु मोक्षः सिध्यति, तस्मात् ज्ञानं समाश्रयेत्॥

४. अहंकारदोषः

अहंकारे विनयो नश्यति, विनये नष्टे गुणा यान्ति।
गुणहीनः लोके निन्द्यः, त्यक्तो दुःखं सदा लभते॥

५. लोभदोषः

लोभात् क्षीयते धर्मः, लोभो नयति पतनाय।
लोभी न तृप्यति कदाचित्, तृप्तौ परमं सुखम्॥

६. अविद्यादोषः

अविद्यया जायते मोहः, मोहात् नश्यति सत्यम्।
सत्ये नष्टे भवति दुःखं, तद्विनाशाय ज्ञानम्॥
अहंकारदोषः
(मुक्तछन्दः)
अहंकारो महादोषः, सहिष्णुता परो गुणः।
अहंकारे हता लङ्का, अतिदर्पे पतन्ति नराः॥

मदान्धः पतति सर्वत्र, धर्मेणैव सुखं भवेत्।
विनयेन सदा शान्तिः, धर्मयुक्तः सदा जयति॥
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दिव्यसाधनानि
(मुक्तछन्द )
पिता माता च जीवनस्य प्रथमौ दिव्यसाधनौ।
तयोः श्रद्धासमाचारात् शुद्ध्यते मानसं जनौ॥

पुत्रः पुत्री च धर्मस्य संवर्धननिदर्शनौ।
प्रेमयुक्तेन सेवया भवतः पुण्यसाधनौ॥

पत्नी सहधर्मचारिणी सत्यमार्गस्य साधिका।
तस्याः सम्मानयोगेन भवति चेतना शुद्धिः॥

सुहृदः सत्यदर्पणं दोषगुणप्रकाशिकाः।
तेषां सदुपयोगेन जायते बुद्धिः धारिका॥

गुरवो ज्ञानदीपास्ते तमोमोहविनाशकाः।
तदनुग्रहयोगेन मार्गः स्यात् सुप्रकाशकः॥

एतानि दिव्यसाधनानि ये नराः श्रद्धयोजिताः।
शीघ्रमेव समीपं यान्ति परमेश्वरस्य समीपाः॥

कर्मद्वैविध्यश्लोकः
कर्मण्यस्ति द्वयं नित्यं शुभाशुभसमन्वितम्।
यत्र शुभं भवेत् प्रायं तत् कर्म सुगुणं स्मृतम्॥
यत्राशुभं प्रभूयिष्ठं तद्दोषायैव कर्म संमतम्।
तस्मात् सर्वेषु कर्मेषु बुद्ध्या सम्यक् परीक्ष्यताम्॥
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कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागयुक्त कर्मयोगः
निःस्वार्थभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः उत्तमः।
निष्कामभावेन स्वकर्मणां पालनं हि स्वधर्मः परमः॥
कर्तृत्वाभिमान-फलत्यागेन युक्तं तत् श्रेष्ठमुत्कृष्टम्॥
एतत् सनातनधर्मस्य परमं तत्त्वं युगे युगे प्रकीर्तितम्॥
स्वमार्ग-स्वधर्मनिष्ठा
(मुक्तछन्दः)
स्वमार्गे चलतु नित्यं, न परैः विचलितो भवेत्।
स्वधर्मे स्थितचित्तः स्यात्, न कदापि च्युतो भवेत्॥

नान्येषां मार्गमाश्रित्य, स्वभावं न परिवर्तयेत्।
स्वकर्मसु दृढो भूत्वा, जीवनं सफलं नयेत्॥

भिन्ना जीवाः भिन्नमार्गाः, न तुल्यो भवेत् कश्चिद्।
स्वधर्मे यः स्थितो नित्यं, स एव सफलो भवेत्॥

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भवसागरपारतत्त्वम्
अन्तर्मुख आत्मज्ञानी अतिप्रयोजनम्।
बहिर्मुखता च आसक्तिश्च नित्यम् वर्जनीयम्।
आत्मशुद्धिनिष्कामभक्तिः सह आपेक्ष्यम्।
एतत् सनातनधर्मैकं भवसागरपारतत्त्वम्।
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मायां मोहं दुःखं हरति ईश्वरतत्त्वम्।
(मुक्तछन्दः)
चिकित्सकः न निवारयितुं शक्नोति मायां मोहं च दुःखम्।
केवलम् ईश्वरतत्त्वं निवारयितुं शक्नोति मायां मोहं च दुःखम्॥
केवलम् एतत् ईश्वरतत्त्वं संसारस्य एकमात्रं परमं सत्यम्।
यः जानाति एतत् ईश्वरतत्त्वं सः जानाति संसारस्य सत्यम्॥
यः जानाति संसारसत्यं स पश्यति निजानन्दरूपम्॥
बालगोपालेन ईश्वरलाभः
(मुक्तछन्दः)
मानवो धर्मं कर्म च न जानन्नपि गृहे स्थापयति बालगोपालम्।
चिन्तयन्ति ते,बालगोपालस्य सेवया एव  प्राप्स्यन्तीति परं पदं।

धर्मं वदति वारं वारं,ईश्वरप्राप्तौ प्रथमं शुद्धं मनोऽवश्यकम्।
निष्कामं कर्म,निष्कामो धर्मो,भक्तिर्भक्तसम्मानश्च  प्रयोजनम्॥
बालगोपालेन ईश्वरलाभः
(मुक्तछन्दः)
मानवोऽजानन् धर्मं कर्म च गृहे स्थापयति बालगोपालम्।
चिन्तयन्ति ते, बालगोपालस्य सेवया एव प्राप्स्यन्ति परं पदम्।

धर्मं वदति वारं वारम्, ईश्वरप्राप्तौ शुद्धं मनः प्रथमम् आवश्यकम्।
निष्कामं कर्म, निष्कामो धर्मः,भक्तिः भक्तसम्मानश्च परमं साधनम्॥
💗
कर्मयोगस्य मूलसिद्धान्तः

सर्वकर्मसु स्वभावतः शुभाशुभे इति द्विविधौ फलौ विद्यमानौ।
शुभाशुभकर्मभ्यां जीवः बध्यते, निष्कामकर्मणा बन्धनात् विमुच्यते।
कर्मयोगिन्, एतत् स्मर-
यस्य कर्मणः अन्ते शुभफलम्, तत् कर्म शुभम् स्मृतम्।
यस्य कर्मणः अन्ते अशुभफलम्, तत् कर्म अशुभम् स्मृतम्।
💗
कर्मयोगः भक्तियोगफलम्।
निःस्वार्थकर्मयोगेन कर्मबन्धनानि विनश्यन्ति।
निःस्वार्थभक्तियोगेन मोक्षद्वारं प्रसीद्यति॥
कर्मकाण्डेषु आत्मज्ञानस्य मर्मत्वम्
(कर्मज्ञानसमन्वयविवेकः)
वेदेषु कर्मकाण्डानि शरीराङ्गवदङ्गभूतानि,
सर्वेषामपि तेषां मध्यस्थितं मर्म आत्मज्ञानम्।
यन्मोक्षमार्गद्वारमवगमयति स्वरूपप्रकाशकमेव;
तस्याभावे यज्ञदानतपःक्रियाः
श्रमेणापि कुर्वतां निष्फलाः भवन्ति,
यथा बीजहीनं क्षेत्रं फलसमृद्धये अशक्तमेव तिष्ठति॥
💓
यज्ञाग्निप्रज्वलनम्
यज्ञेऽग्निप्रज्वलनार्थं घृतमेव प्रदीयते ।
मन्त्रपूतेन विधिना तत्कर्म समाचर्यते ॥

नात्यर्थं घृतमुत्सृजेत् नायथाक्रमतोऽचरेत् ।
शुद्धेन मनसा कर्म धर्ममार्गे प्रशस्यते ॥

यज्ञयोगफलभेदः
यज्ञेन स्वर्गगुणधनवरलाभाः संपद्यन्ति स्वफलतः ।
न तु तेनैव लभ्येत् साक्षादीश्वरसन्निधिः फलतः ॥

योगाभ्यासेन दुःखनाशशान्तिचैतन्यवृद्धयः स्युः क्रमतः ।
भगवत्प्राप्तिरपि स्यात् भक्तिज्ञानसमन्वयतः ॥
वेदार्थसारः
वेदो हि शब्दब्रह्मैव रहस्यान्तरदुर्लभः ।
तं वेत्ति केवलो देवो सम्यगाच्नुते नान्योऽर्थं ॥
ज्ञानकर्मप्रयोजनं तत्र मुख्यं सनातनम् ।
ब्रह्मात्मैक्यविज्ञानं तद्वेदार्थस्य सारकम् ॥
चतुर्वेदानां विषयवस्तुः।
सृष्टे रहस्यं विमलं च तत्त्वं,ऋग्वेदवाणी प्रथमे प्रबोधा।
यज्ञक्रमाणां विधानदाता,यजुर्वेद एष मधुरः स्वरात्मा॥
स्तोत्रात्मकः देवस्य गीतैः प्रहवो मनोज्ञः, सामगतो गुणाढ्यः ।
शान्तिप्रदः सौम्यविधिप्रकाशी,वेदश्चतुर्थोऽथर्वणो निरामयः॥
💗
द्विज–द्विजत्वम् 
शृणुत द्विजगणाः, एतत् सत्यवचनम्,
मा कदापि कुरुत द्विजत्वाभिमानम्।
द्विजस्यैष अभिमानः शत्रुरेव समः॥

विनम्रतैव हि ज्ञानं द्विजस्य श्रेष्ठं शस्त्रम्।
तस्य शस्त्रस्याग्रे सर्वं नतमस्तकम्॥
💓
आत्मा-परमात्मा
यस्मिन् मध्ये विद्यते आत्मज्ञानम्,
स एव हि कथ्यते आत्मा॥
यस्मिन् मध्ये विद्यते परमं ज्ञानम्,
स एव हि कथ्यते परमात्मा॥

आत्मा-परमात्मा
यस्य मध्ये विद्यते आत्मज्ञानम्।
स एव कथ्यते आत्मा॥
यस्य मध्ये विद्यते परमं ज्ञानम्।
स एव कथ्यते परमात्मा॥

आत्मा-परमात्मा
यस्मिन् मध्ये विद्यते आत्मज्ञानम्,
स एव हि कथ्यते आत्मन्॥

यस्मिन् मध्ये विद्यते परमं ज्ञानम्,
स एव हि कथ्यते परमात्मन्॥
आत्मा–देहगृहविचारः
(मुक्तछन्दः)

यदा गृहमिदं जीर्णं न वासायोपपद्यते।
तदा निवासिनस्तस्मात् त्यजन्ति स्वयमेव ते॥

तथा शरीरमेतज्जीर्णं न कर्मण्युपपद्यते।
तदा देहं परित्यज्य जीवोऽन्यत्रोपपद्यते॥

यदा गृहमिदं भग्नं न पुनर्निर्मितुं क्षमम्।
तदा तद् धूलिरूपेण नश्यत्येव निरन्तरम्॥

तथा शरीरमेतद् भग्नं न पुनः स्थापयितुं क्षमम्।
स्वभावादेव विनश्यति चोपगच्छति पञ्चत्वम्॥

न शक्यं तदिदं रूपं पुनरेव उद्जीवितुम्।
न प्राणः पुनरायाति त्यक्ते देहे कथंचन॥

एष धर्मः सनातनः शास्त्रेषु परिकीर्तितः।
देहभेदेऽपि नित्यात्मा याति स्वमार्गेणैव॥

इत्यात्मदेहगृहविचारः समाप्तः॥
💓
वेददृष्ट्या मूर्तिस्नानम्
न वेदमन्त्रेषु क्वापि दुग्धाभिषेको विधीयते,
न श्रुतिषु प्रतिमास्नानं स्पष्टतया प्रकीर्त्यते॥

नाग्निहोत्रेषु देवस्य दुग्धस्नानं प्रकाशितम्,
न सोमयागेषु तद्वाक्यं विधिरूपेण निर्दिष्टम्॥

अग्नये घृतधारास्तु वेदमन्त्रैः प्रदीयते,
सोमो यागेषु विधिना श्रद्धया प्रविधीयते॥

आपः शुद्ध्यै प्रशस्यन्ते मन्त्रशक्तिप्रबोधिताः,
सत्यं ब्रह्म सनातनं ऋषिभिः सम्प्रकीर्तितम्॥

न देवो दुग्धधाराभिः तुष्यति स्वमहिम्नि हि,
पूर्णस्य न किमप्यस्ति आवश्यकं कदाचन॥

भक्त्या तु रूपकल्पनया प्रेमधारा प्रवर्तते,
तया जगदपि देवत्वं भावतः प्रतिपद्यते॥
सत्यधर्ममहिमा
(व्यक्तिकेन्द्रितभाव)
सत्यं वचनं, सत्यस्य पालनम्।
महान् धर्मः, महान् अर्पणम्।
सत्यपथि सत्ये स्थितिः,
स दुर्लभः, सः निर्मलः॥
सत्यधर्ममहिमा
(तत्त्वप्रधानभाव)
सत्यं वचनं, सत्यस्य पालनम्।
महान् धर्मः, महान् अर्पणम्।
सत्यपथि सत्ये स्थितिः,
तत् दुर्लभं, तत् निर्मलम्॥
💓
दुर्भाग्यम्
मम दुर्भाग्यस्य कारणं नान्यो दोषी।
मम दुर्भाग्यस्य कारणं अहम् एव दोषी॥

दुर्भाग्येऽपि अहं पश्यामि नवं प्रकाशम्।
दुर्भाग्यस्य नाशात् सर्वं पुनः भविता सुखदम्॥

दुर्भाग्यं कदापि न मन्येत महाऽहितकरम्।
दुर्भाग्यनाशात् पुनरागमिष्यति सुखं परम्॥
एकत्वं दैवतत्त्वस्य
(एकत्वभावः)
नानानाम्ना स एकः, नानामार्गैः स एव हि।
सर्वेषां पथिकानां सः, एकं लक्ष्यं सनातनम्॥ 

कृष्णवेणुनिनादेन विश्वगीतं प्रवर्तते।
अल्लाहस्य इच्छया सर्वं सृष्टिचक्रं प्रवर्तते॥

कृष्णे प्रेम च लीला च, दिव्यभावः प्रकाशते।
ईश्वरे सत्यकृपा च, हृदि नित्यं विराजते॥

नानाभाषासु भेदोऽस्ति, तत्त्वं तु न भिद्यते।
एकं नित्यं सनातनं, नानानाम्ना प्रकीर्त्यते॥

बलभद्रः बलज्ञानैः, मार्गदर्शी सदा स्थितः।
अज्ञानात् पारमागतान् जनान् नयति सत्पन्थाम्॥

ईशुपुत्रे त्यागदृष्ट्या प्रेमकारुण्यदर्शनम्।
दर्शयति सदा लोके विनयस्य महात्म्यम्॥ 

नानामार्गाः समायान्ति, लक्ष्यं तु एकमेव हि।
यथा सूर्यकिरणाः सर्वे, एकस्मात् उद्भवन्ति हि॥

मा कुरुत भेददृष्टिं, मा कुरुत अज्ञानवृत्तिम्।
सर्वे यान्ति परं ज्योतिः, एकमेव सनातनम्॥ 
भेदभावः
(देवभावः–मनुष्यभावः)
यः शास्त्रवाक्यैः जानाति परमं देवं श्रीजनार्दनम्।
शुद्धचित्तः पश्यति तस्मिन् दिव्यं तस्य सौरभम्॥
अज्ञात्वा तु परं तत्त्वं मनुष्यं मन्यते तम्।
दुर्गन्धं तत्र पश्यत्येषः न पश्यत्यन्यथा समम्॥
-----------------------------
पश्यत्येषः = पश्यति + एषः
पश्यत्यन्यथा = पश्यति + अन्यथा

सर्वधर्मसमभावः
(मुक्तछन्दः)
सर्वेषां धर्माणां तु तत्त्वमेकमेव,
हृदये हृदये दीप्यते दिव्यं तेजः।

सर्वेषां देवोऽपि एक एव नित्यः,
धर्मरूपेभ्यः सर्वेभ्यः परतः स्थितः॥

धर्मत्यागः तु अज्ञानस्य लक्षणम्,
यदा नात्मा पश्यति स्वान्तर्ज्ञानम्।
अज्ञानता – आत्माभिमानः – आत्मसत्ता
(मुक्त छंद )
यस्य देवस्य वा गुरोः विद्यते आत्माभिमानः।
स निश्चयेन स्वास्तित्वं नष्टवान्; स एव महाऽज्ञानः॥

यः देवः गुरुर्वापि याचते प्राणानां जीवस्य च बलिदानं।
निश्चयेन स स्वास्तित्वं नष्टवान्; स तु महाऽज्ञानः॥

यो देवो वा गुरुर्वापि याचते दरिद्रस्य सकाशात् धनं।
स निश्चयेन स्वास्तित्वं नष्टवान्; स एव महाऽज्ञानः॥

यत्र अहंकार एव देवत्वम्, तत्र न धर्मः न च सत्यं।
💗
परचर्चा परनिन्दा पापम्।

परचर्चा अनुचितं पापं न पातकम्।
परनिन्दा महापापं, परनिन्दा महादुःखम्।
परनिन्दा भयाभयं, परनिन्दा महाभयम्॥

परनिन्दा अनुचितं, परनिन्दा महादोषः।
द्वेषाहङ्काराज्ञानवशात् परकीं प्रतिष्ठां हन्ति।
इति निन्दा पापरूपिणी, लोकधर्मं दहति॥
हिंसादमनम्
अहिंसा परमो धर्मो हिंसा महापापम्।
हिंसाया दमनं धर्मः लोककल्याणकारणम्॥
पापनिवारणं श्रेष्ठधर्मः
पापिनः पापनिरोधो धर्म एव आवश्यकः।
पापकर्मणि दण्डदानं धर्मोऽप्यत्र आवश्यकः॥

पापस्य पूर्वबोधनं तद्वारणं च शास्त्रतः।
एष धर्मः परः प्रोक्तः सद्भिः सत्यपरायणैः॥
अधर्म-पापिपोषणदोषः 
(मुक्तछन्दः)
 पापिनं पालनं लोके निश्चयं पापमुच्यते।
 पापिनः संरक्षणं तु महापापं प्रचक्षते॥

 अधर्मस्य पालनं हि  पापं निगद्यते।
 अधर्मप्रोत्साहनं तु घोरं पापं प्रचक्षते॥
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स्वात्मतत्त्वन्यायः
(आत्मज्ञेयधर्मः)
न जनकल्याणार्थम् विना पूर्वजन्मप्रकाशनम्
निषिद्धं दृढधर्मेण दिव्यन्यायेन शाश्वतम्॥

स्वात्मतत्त्वविवेकः स्यात् कृतिः प्रत्येकस्यात्मनः।
स्वयमेव हि विज्ञेयं आत्मरूपं सनातनम्॥
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निन्दा-समालोचनयोः तत्त्वविवेचनम्।
न्यायसम्मता समालोचना, यदि स्याद् हितकारिणी।
सा शुभा जनहितायैव, शुद्धभावप्रदर्शिनी॥


द्वेषतः या तु निन्दा स्यात्, असत्यदोषयुक्ता सा।
सा निन्दा निन्दनीया एव, कीर्तिनाशप्रदा सदा॥

सत्यं हितं च यद् वाक्यं, सा निन्दा शुभदा स्मृता।
अन्यथा यत् किमप्य् उक्तं, सा निन्दा विषवत् सदा॥
अनन्तो हरिः, अनन्ता हरिकथा,
अनन्तानि शास्त्राणि॥
(मुक्त छंद )
अनन्तो हरिरव्यक्तो लीलाश्चास्यानन्ताः।
शास्त्राण्यप्यनन्तानि कथाश्चास्यानन्ताः॥ 

अनन्तोऽस्य गुणो दिव्यो नास्ति तस्य परिसीमना।
न कश्चिज्जानाति पूर्णं तस्य दिव्यं चरितं नरजनाः॥

नादिर्न चान्तो यस्य प्रभोर्नित्यविभूतिषु।
अनन्तेऽस्मिन् हरेः कीर्तिः प्रवहत्येव मे चेतसि॥

निष्कामकर्मणा नित्यं निष्कामधर्मपालनात्।
लभ्यते स हरिः साक्षान्निष्कामभावनात्॥ 
हरिभक्तः।
हरिभक्तो न कामयते पदवीं, न कामयते सम्मानं।
निष्कामप्रेमप्लावितनेत्रः हरिमयः तस्य प्राणः।
न वादो न विवादोऽस्ति, एकान्तमेव तस्य प्रियम्।
न शिखा न तिलकं तस्य, हरिप्रेमैव तस्य बलम्।
मृत्युशोकविषादः
(मुक्त छंद )
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
स्वजनस्य परस्य वा मृत्यौ कदाचित् न भवेत् विषण्णः।
जागतिकनियमानुसारम् यस्य मृत्युर्भवति, तस्य जन्म स्यात् पुनः।
एतत् स्मृत्वा, अविद्यया मोहितः सन् कदाचित् न भवेत् विषण्णः।
मनसि धारय: यस्मै त्वं विषण्णः,सः परजन्मनि स्वकर्मसु मग्नः।
एतद् ज्ञात्वा,
आत्मानं मन्यते अकिञ्चनं,नित्यं कुरु श्रीहरेः चरणस्मरणम्।
यः करिष्यति दुःखहरणं,सर्वपापतापभयशोकनिवारणम्।
💗
समदृष्टिः समभावः।
वरिष्ठस्य सम्मानः, कनिष्ठस्य अपमानः।
एतद् दृश्यं युगे युगे सदा दृश्यमानम्।
समदृष्टिः समभावश्च दृश्यं अति दुर्लभम्।
येन ईश्वरभक्तिः भवति, अतीव सरलम्।
समत्वभावः 
(मुक्तछन्दः)
सिद्धौ न हृष्यति धीरो, न विषीदति विपत्तिषु सदा ।
समत्वेन स्थितो नित्यं, भवति सः पण्डितः सदा ॥ 

लाभालाभौ समौ यस्य, जयापजयौ समौ सदा ।
न स्पृहा न च द्वेषः, तस्य बुद्धिः स्थिरा सदा ॥

सुखदुःखे समे कृत्वा, न चलति मनः सदा ।
समदर्शी स विज्ञेयः, धीरः शांतः स एव सदा ॥

कर्मण्येवाधिकारोऽस्ति, फले नास्ति कदाचन ।
इति ज्ञात्वा स्थितो यः स्यात्, लभते शान्तिमुत्तमाम् ॥
ज्ञान-वैराग्य-भक्ति-समभाव-संगमः
(मुक्तछन्दः)
यः ज्ञानं धारयति नित्यं,वैराग्यं च मनसि स्थिरम्।
ईश्वर-भक्तिमयं हृदयं,सर्वं तस्मै भवेत् समम्॥

निश्चलं चित्तं निर्विकारं, समभावेन सुखदुःखम्।
धीरः सद्गुणैः पूज्यः स्यात्, शान्तिं सदा लभते नरः॥
संसारोपाधिसाधनत्वबोधः
(जीवधर्मप्रदीपः)
स्वभावतो हि जीवस्य निष्कामः कर्म एव ।
निष्कामा भक्तिरप्यस्य सत्यधर्मः स एव ॥

पित्रापत्यकलत्रादि सम्बन्धाः कर्म एव ।
देहान्ते विलयं यान्ति क्षयहेतुः स एव ॥

देहो लोकाश्च सम्बन्धा उपायाः सर्व एव ।
आत्मबोधाय मोक्षाय ब्रह्मैक्यं तु ध्रुवं एव ॥
भगवत्कथाश्रवणस्य महिमा
(तीर्थातीतं भगवत्स्मरणम्)

अहं अज्ञानी मनसि आशां बिभ्र्याम्।
सर्वानि तीर्थानि भ्रमणेन द्रक्ष्यामि इत्यहम्।
परन्तु भगवत्कृपया श्रवणे ज्ञातवान्।
केवलं भगवत्कथाश्रवणमननचिन्तने।
सर्वतत्त्वतीर्थपुण्यज्ञानं विद्यमानम्।
एष अज्ञानिभक्तेभ्यः ददाति ऊर्ध्वमार्गम्।
एष सनातनधर्मस्य सनातनमतम्॥
कलितत्त्ववर्णनम्
(मुक्तछन्दः)
न कलिः राक्षसो नापि नासुरः सत्ये कथ्यते।
यदा धर्मरक्षकः भगवान् तिरोभवति, न भयं विद्यते॥

तदा ब्रह्मासृष्टेषु भूतेषु स्वेच्छाचारो दुराचारः प्रवर्तन्ते।
भ्रष्टाचार-दुराचार-धर्मग्लानिः सा कलिः कथ्यते॥
कलि नाश तत्त्व
सात्त्विकं अन्नं गृहाण, सत्यं धारय, सत्त्वं धारय।
निष्कामं कर्म नित्यं आचर, सर्वं कर्म हरये अर्पय।

भ्रष्टाचार-स्वेच्छाचारं दुराचार-धर्मग्लानिं न धारय।
सदाचारं संयमाचारं सुचरितं धर्मपालनं संवर्धय।

धर्मं सर्वदा मनसि धारय, हरिं सर्वदा सञ्चिन्तय।
स्वं परिवारं प्रेम कारय, तस्मिन् प्रेम्णि विस्तारय।

एतस्मिन् प्रेम्णि कलिः नश्यति, सत्यधर्मः प्रकाशते।
सदैव धर्मप्रेमस्नेहयुक्तं चित्तं धर्मपथे प्रवर्तते॥

विज्ञान - श्रीभगवान्।
अज्ञानी मन्यते विज्ञानमेव महाबलिनम्।
विज्ञानमेव सर्वस्वं, शेषं सर्वं मलिनम्।
विज्ञानी वदति यत् सर्वं ईश्वरस्य दानम्।
वयं केवलं कुर्मः श्रमं च अनुसन्धानम्।
अस्माकं फलानि ददाति श्रीभगवान्।
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पूर्णगुरुः
शास्त्रज्ञानसमायुक्तो ब्रह्मतत्त्वविशारदः ।
साधनयोगसमन्वितो ब्रह्मसाक्षात्कृतिदः ॥

शुद्धान्तःकरणोपेतो निर्मलो विगतकल्मषः ।
एवंलक्षणसम्पन्नः स एव पूर्णगुरुः परिकीर्तितः॥


अनादि गुरु मन्त्रः (Mantra):
गुरुर्ब्रह्म गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो जगदीश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
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गुरु-स्तोत्रम्
(गुरुतत्त्व)
गुरुर्ब्रह्मा गुरुः शंकरः गुरुर्देवो जगदीश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

सिद्धगुरोर्द्वौ गुणौ स्मृतौ -सिद्धिश्च ब्रह्मज्ञानम्।
ताभ्यां यः शिक्षयेत् शिष्यान् स एव श्रीगुरुः मतः॥

गुरुशिष्यतत्त्वम्
(नूतनं ज्ञानम्)
शृण्वन्तु सर्वे गुरुजनाः एतद्वचनम्-
शिष्यस्य चित्ते आवश्यकं शून्यस्थानम्।
तदैव शिष्यः लभते नूतनं ज्ञानम्॥

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परमगुरुः गुरुः गुरुः शक्तिः ।
(गुरु-तत्त्व)
(मुक्तछन्दः)

परं ज्योतिः परं ब्रह्म स एव परमगुरुः।
स एव परमशक्तिः तस्यांशः हि श्रीगुरुः॥

परब्रह्मणि प्रेम श्रद्धा चैव सम्बलम्।
स एवेश्वरशक्तिः श्रीगुरोः परमं बलम्॥

छायाज्योतिः अबाधा साधनाशक्तिः।
यस्य मध्ये वर्तते स लभते श्रीशक्तिम्॥

यः लभते परमगुरोः दिव्यां चेतनां शक्तिम्।
स एव हि ब्रह्मांशः स एव अमोघशक्तिः॥

टीका
यः जगतः नाथः स एव श्रीजगन्नाथः।
 तेन सह एकीभूतो यो गुरुः,
स एव सर्वजगतां गुरुः- 
जगद्गुरुरिति प्रसिद्धः।
अबाधा = unhindered / unobstructed
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गुरुकृपया ईश्वरदर्शनम्।
सद्गुरोर्वाक्ये पूर्णः विश्वासः।
ईश्वरे पूर्णसमर्पणं, पूर्णः विश्वासः।
समयस्य प्रतीक्षा, सदा सत्कर्मधर्मः।
एतेन ईश्वरदर्शनं भवति – इति धर्मः।
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गुरुलक्षणम्
(मुक्तछन्दः )
न जन्मना न चाश्रमेण न वेषेण न कीर्त्या ।
न बाह्याभरणैर्गुरुत्वं न लोकोक्त्या प्रसिद्ध्या ॥

शास्त्रेषु निपुणो विद्वान् श्रुतिसारपरायणः ।
ब्रह्मणि दृढनिष्ठो यः स गुरुः कथ्यते तत्त्वदर्शिभिः ॥

ब्रह्मतत्त्वस्य साक्षात्कारी तत्त्वदर्शी महामतिः ।
अनुभूतस्वरूपज्ञः स विज्ञेयः सुदीधितिः ॥

दमशमसमायुक्तः शुद्धान्तःकरणो जितेन्द्रियः ।
लोभमानविहीनात्मा स ज्ञेयः संयमी मुनिः ॥

करुणासिन्धुः सर्वेषां भूतहिते सदा स्थितः ।
ब्रह्मण्येव स्थितप्रज्ञः शान्तचित्तो निरामयः ॥

विरक्तो विषयेष्वेव निर्ममो निरहङ्कृतिः ।
एवंलक्षणसम्पन्नः स गुरुः परिकीर्तितः ॥
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ईश्वर–दर्शन–श्रवण–तत्त्व–श्लोकः
छायाज्योतिषु संयतात्मा साक्षाद् पश्यति देवम्।
नादे सूक्ष्मे हृदि श्रुत्वा बोधयत्यात्मनं दिव्यम्॥
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ईश्वरान्वेषणात् निवृत्तिः
(हृदयस्थ ईश्वरः)
किमर्थमहम् भगवन्तं यत्रतत्रान्वेषयामि?
स एव हृदये मम विराजते महिमास्वामी॥

अन्तर्बहिश्च व्याप्नोति ज्योतिरूपो दयानिधिः
शान्तिमार्गे नयत्येव साक्षी सदा करुणानिधिः॥

मन शुद्ध करें, ईश्वर हृदय में ही मिल जाएंगे।

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योगसाधनायाः स्थितिः।
समाधिः योगस्य चरमा स्थितिः।
समाधिस्थे नश्यति संसारस्थितिः।

समाधेः पश्चात् भवति ऊर्ध्वगतिः।
अनन्तरं छायाशक्तिः प्रादुर्भवति।

तदनन्तरं ज्योतिशक्तिः प्रादुर्भवति।
ततः अबाधशक्तिः आगच्छति।

एषा योगसाधनायाः परमा स्थितिः॥
💗
योगसाधनायाः स्थितिः
योगमार्गस्य एषा हि क्रमिका परा स्थितिः।
ध्यानं तत्र प्रथमं, द्वितीया समाधिरेव गतिः॥

समाधिस्थे विलयं याति नामरूपात्मिका स्थितिः।
ततः प्रसूता भवति चेतनाया ऊर्ध्वप्रवृत्तिः॥

सूक्ष्मा शक्तिः प्रथमतो छायारूपा प्रतीयते।
ततो दिव्या प्रकाशात्मा ज्योतिःशक्तिः प्रजायते॥

तदनन्तरमभिव्यक्ता सर्वगामिन्यबाधा शक्तिः।
एषा योगसाधनायाः चरमा परमा स्थितिः॥
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ध्यान → समाधि → नामरूप-लय →
 चेतना की ऊर्ध्वगति → छाया शक्ति 
→ ज्योतिःशक्ति → अबाध शक्ति
श्रीकृष्णध्यानतत्त्वम्
(मुक्तछन्दः)
कं ध्यायेत् स परं तत्त्वं, यतः सूर्यचन्द्रमसौ।
नास्त्यन्यत्तत्त्वमुत्तुङ्गं, स्वात्मन्येव स संस्थितः॥

नास्त्यन्यो देवो ध्येयः, नान्यत् किञ्चित् परायणम्।
सर्वकारणभूतात्मा, स्वनाम्न्येव विलीयते॥

यथा गीता शास्त्रवरे, आत्मैव सन्निहितः सदा।
तथा भागवतेऽप्युक्तं, स्वात्मन्येवावतिष्ठते॥

निर्गुणं ब्रह्म यत् प्रोक्तं, तदेव स्वप्रकाशकम्।
नान्यत्तत्त्वं न भेदोऽस्ति, स एवैकः हरिः सत्यम्॥

ये तु भिन्नं परं मन्यन्ते, मोहिता अज्ञानवृत्तयः।
न जानन्ति शास्त्रार्थं, नापि बुध्यन्ते तत्त्वसारम्॥

गुरुशिष्यतत्त्वम्
(नूतनं ज्ञानम्)
शृण्वन्तु सर्वे गुरुजनाः एतद् वचनम्-
शिष्यस्य मस्तिष्के आवश्यकं शून्यस्थानम्।
तदैव शिष्यः प्राप्तुं शक्नोति नूतनं ज्ञानम्।
परमधामप्राप्तिः
कामनार्थविवर्जितः त्यक्तस्वजनबन्धनः।
श्रीनाथं शरणं गतः निःस्वार्थभक्तिभावेन॥

भजनैः कीर्तनैर्नित्यं यः स्मरत्यखिलेश्वरम्।
स एव लभते नूनं परं धाम सनातनम्॥

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मन्त्र–यज्ञ–पूजा–कथा

ब्रह्मणा आरम्भितो मन्त्रः
ब्रह्मणैव समापितः ।
स एव श्रेष्ठो मन्त्रः
सर्वमन्त्रेषु कीर्तितः ॥

ब्रह्मणा आरम्भितो यज्ञः
ब्रह्मणैव समापितः ।
स एव श्रेष्ठो यज्ञः
सर्वयज्ञेषु कीर्तितः ॥

ब्रह्मणा आरम्भिता पूजा
ब्रह्मणैव समापिता ।
सा एव श्रेष्ठा पूजा
सर्वपूजासु कीर्तिता ॥

ब्रह्मणा आरम्भिता कथा
ब्रह्मणैव समापिता ।
सा एव श्रेष्ठा कथा
सर्वकथासु कीर्तिता ॥

ब्रह्मणा= ब्रह्मन् + तृतीया एकवचन
ब्रह्मन्- अर्थः : परं ब्रह्म/परम ब्रह्म
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पूजा
यस्यां पूजायां न आवाहितं ब्रह्मरूपम्।
सा पूजा नाममात्रा, न तु शुद्धतत्त्वम्॥
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पञ्चदैवता-स्वरूपवर्णनम्
जगन्नाथं बलभद्रं च प्रद्युम्नं च अनिरुद्धम्।
परमात्मिकां प्रकृतिं च सृष्टेः पञ्चदैवतानि॥

एतदतिरिक्तं सर्वेषु गृहगृहेषु पञ्चदेवताः।
ते स्वस्थानवर्तिनः सन्ति पञ्चदेवा इति स्मृताः॥
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अज्ञानिनां मिथ्याप्रचारः
(ब्रह्मतत्त्वे अज्ञानम्)
अज्ञानी मूर्खः न जानाति श्रीबलभद्रम्।
श्रीशेषनागं बलभद्रनाम्ना करोति वर्णनम्॥

श्रीप्रद्युम्नं च श्रीअनिरुद्धं च न जानाति।
महाज्ञानी महानिति लोके स्वयं प्रचारयति॥

अज्ञानं ब्रह्मतत्त्वे, अज्ञानं सिद्धियोगशास्त्रे।
मिथ्याज्ञानं स लोकेऽस्मिन् प्रचारयति गुरुरूपे॥
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श्रीजगन्नाथ-बलभद्र-शेषनागतत्त्ववर्णनम्
जगन्नाथः परमब्रह्म आदिदेवः सनातनः।
बलभद्रः तस्य अंशः, जगन्नाथप्राणरूपः॥

शेषनागः अनन्तदेवः बलभद्रांशस्वरूपः।
विश्वभारधरणहारः आदिदेवः सनातनः॥
श्रीजगन्नाथतत्त्वप्रकाशः
(मुक्तछन्दः)
एकः ब्रह्म महाप्रभुः श्रीजगन्नाथः जगदीश्वरः॥
सर्वाधिकारः तस्यैव, नान्यः कश्चित् ईश्वरः॥

मा कुरुत अन्यायं, मा कुरुत अनधिकारकर्म।
अनधिकारिणः सर्वे लभन्ते धर्मतः दण्डम्॥

अहङ्कारो न रोचते, न रोचते बलदर्पणम्।
विनयः प्रीतिकर्ता स्यात्, तदेव ईश्वराभिलषितम्॥

सर्वेश्वरं महाप्रभुं श्रीजगन्नाथं भक्तवत्सलम्॥
स्वांशैः सह महाप्रभुः करोति जगतः सञ्चालनम्॥

भक्तानुग्रहकर्ता सः लीलया धृतवान् मनुष्यताम्।
लोकहितार्थम् उद्दिश्य दर्शयति अद्भुतं चरितम्॥
भक्तवत्सलत्वम्
नाहं स्वतन्त्रः अत्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु मे स्थिता प्रीतिः, ते मे सदा प्राणसमाः ॥

अहम् अस्वतन्त्रः नित्यं, भक्तपराधीन एव च।
स्नेहबन्धेन बद्धोऽस्मि, प्रेम्णा परिकर्षितः॥

न मे स्वार्थः कदाचित् स्यात्, भक्तानां तु सुखं मम।
तेषां विनाशे दुःखं मे, तेषां हर्षे सुखं मम॥

यथा जननी पुत्रे स्वप्राणान् अपि अर्पयेत्।
तथाहं स्वात्मानं भक्तजनाय ददाम्यहम्॥
भक्तवत्सल्य-स्तोत्रम् (2)
नाहं स्वतन्त्र एवात्र, भक्ताधीनः सदा ह्यहम्।
भक्तेषु स्थिता मम प्रीति, ते मम प्राणसखा परमः॥

ये भक्ताः शरणं यान्ति, तेषां रक्षां करोम्यहम्।
नाहं जहामि तान् भक्तान्, मयि ते नित्यशरणम्॥
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देहः आत्मनः
शरीरम् एकम् अद्वितीयम् अनुपमं यन्त्रम्
यस्य अनुरक्षणपोषणम् एकमेव मन्त्रः।
एतदचले सति आत्मा करोति एतस्य वर्जनम्।
तस्मात् शरीरात्मनोः उभयोः ध्यानम् आवश्यकम्।
💗
आत्माभिमानदोषः
यदा आत्मा स्वयमेव परमत्मानं मन्यते,
तदा तस्याधोगतिर् अकल्याणं च जायते।

एतादृशी हि भावना महापापा महाऽनुचिता ।
आत्मानः स्युः परमात्मनः सदा दास्येऽनुगताः ॥
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महतत्त्व–वरिष्ठता–प्रौढत्वम्।
न वृद्धत्वं तु वर्षैः स्यात्, न वपुषा विशेषता।
गुणैः शीलविनीतत्वैः, त्यागेनैव वरिष्ठता॥

न केवलं ज्ञानमात्रेण, न च अभ्यासमात्रतः।
धर्मनिष्ठायां त्यागयुक्तायां, तत्रैव स्यात् प्रौढता॥

धर्म-तत्त्वज्ञानम्।
यो जीवः न जानाति धर्मस्य मूलतत्त्वज्ञानम्।
तस्य समीपे धर्मः घनान्धकारसमानः।

तत्त्वज्ञानमेव हि धर्मपथस्य सूर्यसमानम्।
तत्त्वज्ञानविना धर्मः अन्धकारसमानः।

अन्धधर्मे वर्धते कुसंस्कारः च अज्ञानम्।
अन्धकारे धर्माचरणं मृत्युसमानम्।
ज्ञानम्
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत् स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
न बाह्येषु प्रकाशेषु न शब्देषु न तर्केषु।
शुद्धे चित्ते स्थिते शान्ते ज्ञानं स्वयमेव भाति॥
योगयुक्तो यदा नित्यं स्वात्मन्येवावतिष्ठते।
तस्मै सत्यं स्वयं भाति कदाचन नान्यत्र॥
सत्यज्ञानम्
सर्वस्य जगतः कर्ता, जीवनस्य परं पदम्।
आनन्दस्यैकनिधिः सः, ब्रह्मतत्त्वं सनातनम्॥

सर्वभूतधारकः देवः, जगत् पोषयते नित्यम्।
निःशब्दकृपायुक्तः सः, सर्वं ददाति निरन्तरम्॥

यत्र सर्वे प्रवाहाः स्युर्, लयं यान्ति निरन्तरम्।
रूपातीतं परं तत्त्वं, स्वप्नतुल्यं जगत्त्रयम्॥

यः जानाति हृदि स्वस्य तत्त्वमेतत् सनातनम्।
स एव ज्ञानवान् लोके, पूर्णत्वं लभते ध्रुवम्॥
उत्तमा योनि: तथा ज्ञानप्राप्तिः
(मुक्तछन्दः)
यः आत्मा वारं वारम् उत्तमां योनिम् आप्नोति,
सः जीवनकाले उत्तमं गुरुं प्राप्नोति।। 
सः निश्चयेन ज्ञानवान् भवति।
उत्तमा योनि: तथा ज्ञानप्राप्तिः
(मुक्तछन्दः)
यः आत्मा वारं वारं उत्तमां योनिं प्राप्नोति,
सः जीवन् एव उत्तमं गुरुम् प्राप्नोति।
सः निश्चयेन ज्ञानवान् भवति।

अहङ्कारक्षयः- सत्योदयः
 (विवादनिर्वृत्तिमार्गः)
अहं सदा सम्यगस्मीति वदति मम चेतनम्,
अन्ये सदा तमोलीना इति पश्यामि मानसम्।

अस्वीकारः पिधत्त्येव सत्यद्वारं ममोपरि,
अहङ्कारः दृढः पाशः बध्नाति मां निरन्तरि॥


अहङ्कारदुर्गे उन्नते तिष्ठामि गर्वभूषणः,
सर्वप्रकाशं त्यजाम्येव मूढबुद्धि–विभूषणः।

कृपा तु भिनत्ति गर्वस्य कठोरं बन्धनं ध्रुवम्,
विनयेन द्रवते चेतः शिलावत् जायते मधुरम्॥


विनम्रदृष्ट्या विश्वं पश्यामि समतां श्रयन्,
समर्पणेन हृदयं याति काञ्चनतां पुनः श्रयन्।

गच्छतु गर्वः, करुणा उदेति सर्वबन्धनी,
एकत्वे विनये सत्ये शान्तिर्जायते सनातनी॥


सर्वहृदि वसतं दिव्यं तत्त्वं प्रेम्णा वयं विद्महे,
निःस्वार्थस्नेहयोगेन एकात्मभावं च गच्छ्महे।

अहङ्कारात् परे शुद्धः आत्मा नित्यः प्रकाशते,
साधकः तत्र विलीयेत, केवलं ब्रह्म प्रकाशते॥
सत्यतत्त्वं परं सत्यम्।
वेदः सत्यं, वेदान्तः सत्यः, सत्यमेव प्रामाणिकं शास्त्रम्।
सत्ये प्रतिष्ठिताः सर्वे प्रामाणिकग्रन्थाः,सनातनं धर्मतत्त्वं सत्यम्।
परन्तु सर्वातीतं परं सत्यम्-अनाद्यनन्तं परमं ब्रह्मतत्त्वम्॥
धर्मफलन्यायनीतिः
यत् धर्मः तत् फलम्-एषा श्रेष्ठा नीति:।
अधिकफलाभिलाष एव महादुर्नीति:।
यथाकर्म तथाफलं, तस्माद्भोगः प्रजायते।
भुक्ते फले क्षये जाते, सर्वं शून्यं प्रपद्यते॥

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धर्मतत्त्व
धर्मः सत्यं च महाव्यवस्थितिः।
संसारमार्गे सततं सः गतिः॥

नित्यः स्वयं सिद्धः सुशुद्धनिर्मलः।
रूपं विवर्त्यापि न मुञ्चति मूलम्॥

युगे युगे सत्त्वमयः गुणात्मा।
सत्ये स्थितो धर्म एव हि ब्रह्म॥

तस्मात् सतां जीवनमार्गदर्शी।
धर्मः सनातनः मोक्षप्रदर्शी॥

💓
धर्मतत्त्ववर्णनम्
यदा कश्चिद् धर्मो नित्यसारं विहाय ।
तदा स केवलं लोके उत्सवार्थं भवत्येव ॥

ततः जनाः सत्यपथाद् दूरं प्रयान्ति ।
काले गते तु ते सर्वे प्रवाहे विनश्यन्ति ॥

तस्मात् सम्यग्धर्मपथं सर्वदा सेवनीयम् ।
येनात्मा स्वाभिलषितं धाम पुनः प्रापनीयम् ॥

सम्यग्धर्मपथं=सम्यक् धर्मपथम्

धर्मतत्त्ववर्णनम्
यदा कश्चिद् धर्मो नित्यसारं विहाय ।
तदा स केवलं लोके उत्सवार्थं भवत्येव ॥ 

ततः जनाः सत्यपथाद् दूरं प्रयान्ति ।
काले गते तु ते सर्वे प्रवाहे विनश्यन्ति ॥

तस्मात् सम्यग्धर्मपथं सर्वदा सेवनीयम् ।
येन आत्मा स्वाभिलषितं धाम पुनः प्रापनीयम् ॥
धर्मानुशासनम्
(अनुशासनम्)
अनुशासनं धर्मस्य मूलम्।
तस्य अभावे भवति मूलच्छेदनं।
धर्मानुशासनम्
(अनुशासनम्)
अनुशासनं धर्मस्य मूलम्
तस्य अभावे अस्ति मूलच्छेदनं।
धर्मानुशासनम्
(अनुशासनम्)
अनुशासनं धर्मस्य मूलम्।
तद्विना पतनं निश्चितम्।
धर्म-अधर्म-निर्णयः
(मुक्तछन्दः)
ईश्वरसम्मतं यच्च शास्त्रसम्मतमेव च।
न्याययुक्तं हितकरं स एव कथ्यते धर्मः॥

ईश्वरविरुद्धं यच्च शास्त्रविरुद्धमेव च।
अन्याययुक्तमहितं स एव अधर्मः स्मृतः॥

धर्मस्य सहचरः सत्यः, अधर्मस्य सहचरी मिथ्या।
धर्मस्य सहचरः संस्कारः, अधर्मस्य तु कुसंस्कारः॥

धर्मस्य सहचरी विद्या, अधर्मस्य तु अविद्या।
धर्मस्य सहचरः रिपुजयः, अधर्मस्य तु षड्रिपवः॥

सत्ये स्थितो सदा धर्मः, मिथ्यायां स्थितोऽधर्मः॥
सनातनधर्मशास्त्रेषु एतत् सत्यं प्रकीर्त्यते बारम्बारम्॥
सत्यधर्मलक्षणम्।
स धर्मः परिगण्यः स्यात् यत्र सौहृददर्शनम्।
द्वेषहिंसाकामनानां यत्र नास्ति कदाचन॥

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शास्त्रार्थबोधयोग्यता
शास्त्रार्थबोधाय विवेकयुक्ता
सूक्ष्मा बुद्धिर्विज्ञानयुक्ता ।
युक्तिप्रधाना विशदा बुद्धिः
तद्विना न सिद्ध्येत् गूढार्थगतिः॥
ब्रह्मतत्त्वं
ब्रह्मतत्त्वविहीनग्रन्थजीवगुरुवर्णनम्
(ब्रह्मतत्त्वमहिमा)
यस्य ग्रन्थे न विद्यते ब्रह्मतत्त्वं,
तत् शास्त्रं न भवति पूर्णसत्यम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वं,
स जीवः न जानाति पूर्णतत्त्वम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,
स न गुरुः न पण्डितः शास्त्रमतम्॥

यो जीवः न जानाति ब्रह्मतत्त्वम्,
रुद्धमेव भवति तस्य मोक्षद्वारम्॥
अन्नब्रह्मतत्त्वश्लोकः
अन्नं ब्रह्मेति श्रुतिषु सनातनम्,
भोजनं यज्ञरूपमुदाहृतम्॥
शुद्धे मनसि यत्र हि शुद्धमन्नम्,
तत्रैव वसति परं ब्रह्म नित्यम्॥
निराकार ब्रह्म-साकारब्रह्म साधना

अरूपं शान्तमदृश्यं, मनसोऽपि परं तत्त्वम्।
न रूपं न च नामास्ति, केवलं ब्रह्म नित्यम्॥ 

न दृश्येन्द्रियगोचरे, न तिष्ठति तत्र चित्तं।
चलति विषयमार्गेषु, छायास्वेव वारं वारं॥

कथं गृह्णात्यनन्तं, यः जानाति स्पर्शदृशा।
देहबद्धो हि जीवः, समीपं वाञ्छति सदा॥

तस्मात् सन्तो वदन्ति, सौम्यया वाचा पुनः।
रूपः सेतुर्भवेद् हृदि, भक्तेर्मार्गप्रदर्शकः॥

नामरूपे समारभ्य, चित्तं शान्तिं निगच्छति।
सेवया प्रेमयुक्त्या, तदेकत्वं प्रपद्यते॥ 

न केवलं शिलामात्रं, प्रतिमा भावसूचिका।
अरूपस्य प्रवेशाय, सा भवेदेव साधिका॥ 

रूपादारभ्य मार्गः, अरूपे परिणीयते।
भयसंशयविहीनः, आत्मा तत्रैव लीयते॥

तस्मात् रूपं समाश्रित्य, भावभक्तिं विवर्धय।
ततः शान्ते मनसि, ब्रह्मस्पर्शोऽनुभूयते॥ 
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ज्ञानि–अज्ञानि–धर्मः।
अज्ञानिनः वचने तिष्ठति असत्यता।
ज्ञानिनः वचने तिष्ठति नित्यसत्यता॥

अज्ञानिनः सदा श्रेयः तिष्ठति मौनता।
ज्ञानिनः सदा श्रेयः तिष्ठति विनम्रता।

अज्ञानिनः कथने तिष्ठति उद्धतासत्यता।
असत्यकथने धर्मस्य भवति घोराशुद्धता।

तस्मात् सर्वदा वर्जनीया उद्धतासत्यता।
एतत् परमं सत्यम् सनातने उद्धृतम्॥
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धनार्जन–दानग्रहण–नीतिवचनम्
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
अकारणम् अप्रयोजने परधनग्रहणं न विधेयम्।

बुद्धि–विद्या–श्रमैरेव धनोपार्जनं कर्तव्यम्।
एष एव सनातनधर्मस्य सत्यसनातननियमः।

अकारणम् अप्रयोजने दानग्रहणं न विधेयम्।
असमर्थतायां, धर्मसङ्कटे एव, दानग्रहणं समीचीनम्।
एष एव सनातनपरम्परायाः वास्तविकः सत्यनियमः॥
अज्ञानता – आत्माभिमानः – आत्मसत्ता
(मुक्त छंद )
यस्य देवस्य वा गुरोः विद्यते आत्माभिमानः।
स निश्चयेन स्वास्तित्वं नष्टवान्; स एव महाऽज्ञानः॥

यः देवः गुरुर्वापि याचते प्राणानां जीवस्य च बलिदानं।
निश्चयेन स स्वास्तित्वं नष्टवान्; स तु महाऽज्ञानः॥

यो देवो वा गुरुर्वापि याचते दरिद्रस्य सकाशात् धनं।
स निश्चयेन स्वास्तित्वं नष्टवान्; स एव महाऽज्ञानः॥
यत्र अहंकार एव देवत्वम्, तत्र न धर्मः न च सत्यं।
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ग्रहणतत्त्वविवेचनम्
छायया छन्नः सूर्यो यथा शास्त्रे प्रकीर्तितः ।
न तत्र क्रियाविधिर्दृष्टो ग्रहणे कर्मणां क्वचित् ॥

न भगवद्गीता-शास्त्रे ग्रहणस्य विशेषो विधिरुच्यते ।
प्रकृतेर्गुणचक्रेऽयं भावो ज्ञेयः समाहितैः ॥

स्नानं जपो दानकर्म मन्त्रौच्चारादिकं तथा ।
न वेद-गीतोक्त-आज्ञास्तु स्मार्ताचारप्रवर्तिताः ॥

समत्वबुद्ध्या कर्तव्यं न भयेन कदाचन ।
प्रकृत्याः क्रियमाणोऽयं नियमो दैवसंश्रितः ॥
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रोगव्याधिः सनातनधर्मः
शृणुत भक्तगणाः एतद्वचनम्-
सनातनधर्मे रोगकाले वैद्याश्रयणमेव उत्तमं स्मृतम्।
स्वयमेव श्रीरामेण लक्ष्मणस्य चिकित्सार्थं वैद्यसमाह्वानम्।
एष एव सनातनपरम्परायाः वास्तविकः सत्यनियमः॥
सनातनधर्मनीतिःसूत्रम्
(मुक्त छंद )
सन्तोषः परमं सुखं सुषुप्तिर्निद्रा परं सुखम्।
शुद्धं मितं च भोजनं नित्यं श्रेयस्करं स्मृतम्॥
अधिकं तु तृष्णां वर्धयेत् सर्वदा दुःखकष्टम्।
एतत् सनातनधर्मोपदेशं सर्वयुगेषु प्रकीर्तितम्॥

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मानवानां आयुःप्रमाणवचनम्
(मानवायुः शास्त्रसम्मतम्)
शतं वा शताधिकं वापि मानवानां हि जीवनम्।  
एतत् प्रह्लादभक्तेन सखायः समुदाहृतम्॥  
श्रीकृष्णोपदिशेऽप्युक्तं सम्यगेव निरूपितम्।  
शतं वा शताधिकं वर्षसंख्यं आयुः मानवानाम्॥  
नाधिकं नापि न्यूनं तत् प्रमाणं शास्त्रसम्मतम्॥
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सप्तकर्तव्य-श्लोकाः
पुत्रपुत्रीधर्मो दाम्पत्यधर्मो मातृपितृनिषेवणम् ।
कुलबन्धुपरित्राणं राष्ट्रसेवा च पञ्चमम् ॥

देवप्रकृतिसंरक्षा षष्ठं धर्मस्य लक्षणम् ।
आपद्धर्मः परो धर्मः सप्तमं सर्वरक्षणम् ॥
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चरित्रहनन–दमनम्
कामना–वासना शक्नुवन्ति चरित्र–हनम् ।
पति–पत्नी शक्नुतः तस्य सर्वोत्तमं दमनम् ॥

चतुराश्रमस्य मुख्यधर्मः

चतुराश्रमेषु धर्माः सन्ति परस्पराः स्मृताः।
संन्यासिनः मुख्यधर्मः शान्तिश्च अहिंसाच सदा।
वानप्रस्थस्य मुख्यधर्मः तपस्या च भागवत् भावश्च" सदा।
गृहस्थस्य मुख्यधर्मः प्राणिरक्षा च भगवद्‌सेवाच सदा।
ब्रह्मचारिणः मुख्यधर्मः अध्ययनं च आचार्यसेवाच सदा।
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जगत्संसारभयविश्वासनीतिः
एषः जगत्संसारः महाभयाभयम्।
चतुर्दिक्षु व्याप्तं भयम्; सहजेन न लभ्यते नरोत्तमः।
यावत् न लभ्यते पूर्णं प्रमाणम्,
तावत् न विश्वासं कुर्यात्, न च अनुमानम्॥
एतत् स्मर-एषः जगत्संसारः महाभयाभयम्।
परिवारतत्त्वविवेचनम्
ये स्वजनान् भगवद्भक्तिपथे नियोजयन्ति,
ते सत्यमेव महान्तः, गुणसम्पन्नाः सदा सन्ति।

ये स्वजनान् स्वर्गगम्यपथे प्रबोधयन्ति मानवाः,
ते खलु परिवाराः सन्तः, शेषाः नाममात्रकाः।

ये स्वजनान् पापमार्गे प्रबोधयन्ति मानवाः,
ते खलु परिवाराः न सन्तः, वस्तुतोऽधममार्गगाः॥
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महान्
(मुक्त छन्दः)
यः स्वयम् आत्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।
यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥
भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥
उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥

महान् 
(मुक्त छन्दः)
यः स्वयमात्मानं महान् मन्यते स न भवति महान्।
यं भगवान् महान् करोति स एव भवति महान्॥

भावभङ्ग्या वचनेन वेशेन कश्चित् न भवति महान्॥
उत्तमज्ञानेन च उत्तमकर्मणा एव सर्वे भवन्ति महान्॥

नारीगुण गौरवस्तोत्रम्

स्त्रीणां वर्णनमिदं — सौन्दर्यं गुणसंग्रहम्।

सदा सत्त्वं शुद्धभावं, सुन्दरं वस्त्रधारणम्॥


सुमधुरं वचनं तासां, सेवा दयाभिरन्वितम्।

सर्वहृदयसमर्पेण,  सदा धर्ममार्गे प्रतिष्ठिताः॥


सत्त्वशुद्धं सदा भुञ्ज्युः, शान्तभावपरायणाः।

हरिकथाश्रवणरताः, सत्यदयान्विताश्च ताः॥


सर्वा नार्यः दयामूर्तिः, मायाया जननीरूपाः।

ये स्वर्गात् अपि शोभन्ते, रूपगुणसमन्विताः॥


रूपे गुणे च संपन्नाः, सत्त्वशालिन्य एव ताः।

सुवर्णलक्षणा नार्यः, पूज्या सर्वजनैः सदा॥


भगवान् उवाच, प्रकृतिः पुरुषः परब्रह्मरूपः।

तर्हि कथं भवति स्त्रियोऽपुंसयो र्भेदभावः॥

समता–शान्ति

जहाँ समता, वहाँ शान्ति निवास;

जहाँ विषमता, वहाँ द्वन्द्व प्रयास।

समता जहाँ, वहाँ शान्ति बसेरा,  

समानभाव हर ले मन का अँधेरा।

एक-सा भाव, एक-सी दृष्टि,

जग में खिल उठती है मानव सृष्टि।


विषमता जहाँ, वहाँ द्वन्द्व प्रबल,

असमानता से टूटे हृदय का बल।

भेद की ज्वाला जब मन में जले,

संघर्ष के बीज तभी जग में फले।


समानता से समता का जन्म,

समता से शान्ति-यही है धर्म।

भिन्नता यदि बन जाए अभिमान,

वहीं से उठता है कलह-तूफ़ान।


इसलिए हे मानव, यह सत्य जान

समता ही शान्ति, विषमता विघातक मान।

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गृहस्थाश्रम-निष्काम कर्म – संसार धर्म।

निष्कामं कर्म सदा सर्वदा मनः-निवेशेन कुरुत।

निष्कामं धर्मं सदा सर्वदा महा-आनन्देन पालय।


ईश्वरे पूर्णं विश्वासं कुरुत, स्वयं तस्य दासं मनसि धारय।

सर्वेषु जीवेषु दयां कुरुत, दीन-दुःखितेभ्यः दानं कुरुत।


नित्यं सर्वेषां सेवा कुरुत, संसार-धर्मं पूर्ण-रूपेण पालय।

सर्वाणि कर्माणि ईश्वराय अर्पय, सदा सर्वदा तं मनसि धारय॥

नित्यं पठेयुः गीता-भागवतम्।
मुक्तिमोक्षप्रदाते एतद् द्वयम्॥
 जीवनतत्त्वम्
(मुक्त छंद )
ईश्वरेण प्रदत्तोऽयं कालमन्त्रः शरीरिणाम्।
अदृश्यो दिव्यवरदः सर्वजीवहिताय सः॥ 

हृदयेषु निहितोऽयं गुह्यदीप इव स्थितः।
स्वयमेव प्रज्वलितव्यः जीवनार्थप्रकाशकः॥ 

केचनैनं प्रयुञ्जते करुणादीपवर्धने।
केचन मोहलोभाभ्यां संसारपथं धावन्ति॥

केचन सन्ति ये लोके तारका इव शोभनाः।
परोपकारनिरताः कुर्वन्ति जीवनं शुभम्॥ 

स्वातन्त्र्यं चयनं चैव एष मन्त्रः प्रदर्शयेत्।
उत्थानाय पतनाय जीवने मार्गदर्शकः॥ 

सर्वेभ्यः प्रददौ देवः कर्ममार्गप्रदर्शकम्।
स्वकर्मणा हि जीवोऽयं स्वगतिं सम्प्रपद्यते॥

यदा तु समाप्तिमेति कालमन्त्रः शरीरिणाम्।
न धनं न च वै मित्रं तदा त्रातुं समर्थकम्॥

मृन्मयं देहमेतत्तु पुनरेव धरां गतम्।
कालः शनैः समाप्नोति जीवनस्य कथामिमाम्॥ 

कर्मसत्यानि बीजानि यानि लोके प्ररोपितम्।
तान्येव शेषतां यान्ति वातवेगेऽपि संस्थितम्॥ 

नाटकमिव जीवनं भूमौ देवेन निर्मितम्।
मन्त्रक्षये समाप्तं स्यात् जीवितस्य नाटकम्॥ 
जीवनपाठक्रमः
ये नैव जानन्ति गतिगतिमिमां पूर्वजन्मान्तरे।
जीवन्निह तेषु ते विदधते पाठक्रमं केवलम्॥

ये तत्त्वं विदितं पुनर्जनिमरणं ज्ञात्वा भवन्ति प्राज्ञाः।
तेऽध्यायन्ति यथार्थमात्मविवेकं धर्मो हि सर्वस्य पाठः॥
दुर्भावना–कर्म–पापनिर्णयः
दुष्कर्मकरणेनैव सदा पापं प्रवर्तते।
केवलेन दुर्भावेन पापं न प्रवर्तते॥

यदा दुर्भावना कर्म प्रेरयति मानवम्।
तदैव पापं जायते, न भावे केवलम्॥

तस्मात् दुर्भावनानां दमनं परमं हितम्।
तदर्थम् ईश्वरसङ्गसत्सङ्गयोः अत्यावश्यकम्।
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दया-दण्डः
(मुक्तछन्दः)
अज्ञानेन कृतं पापं दया भवति सदा।
ज्ञानेन कृतं पापं दण्डः निश्चितः तदा॥

सर्वदा कर्मफलं ज्ञात्वा विवेकं सम्पादयेत्।
यद् अज्ञानात् कृतं पापं तत् क्षम्यतामिति स्फुरेत्॥
दयाधर्मनीतिः
(मुक्तछन्दः)

दया हि धर्मस्य मूलं, दया हि सर्वसुखप्रदा।
दया हि मानवत्वस्य भूषणं, दया हि परमा स्मृता॥

दया न केवलं वाक्ये, न केवलं भूषणम्।
कर्मणा सा प्रकटिता भवेत्, तदा धर्मः फलप्रदः॥

नित्यपापिनि चापराधिनि दया ह्यसत्कर्म कथ्यते।
तस्मिन् उचितं दण्डप्रदानं धर्म इति भाष्यते॥

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प्रेमशक्ति – अनन्तशक्ति

मनुष्यः यः प्रेम करोति स्वपुत्रं च पुत्रिकाम्।
माता-पितरौ बान्धवांश्च भ्रातरं च सतीम्॥

प्रेमभावं स शिक्षेत तेन स्यात् सत्गतिः।
प्रेमभक्तिं करोति यः स लभेत सुमतिम्॥

सुमत्यां जाग्रतायां तु ईश्वरे प्रेम अप्रतिमम्।
ईश्वरे यः प्रेम करोति स लभेत परां गतिम्॥

सतीम् =पतिव्रता, सदाचारी, धर्मनिष्ठ स्त्री

ईश्वर-ईश्वरदूतसङ्गसन्निध्यम्।

अल्पायुषि जगद्यात्रायां,मित्रं कश्चिद् भवेद् नरः।
अन्ये दीपशिखावत् स्युः,क्षणेनैव भवन्ति परः॥ 

अजानन्नपि मार्गार्थं,चेतः कम्पितमानसम्।
स्वकर्मणि प्रवर्तामः,न ज्ञातं भाग्यलिखितं समम्॥ 

यदा तत्त्वप्रकाशोऽन्तः,शङ्काच्छायाः प्रधूयते।
तदा प्रसादः शान्त्याख्यः,हृदि पूर्णत्वम् उदयते॥

देवदूताः हिते नित्यं,विदन्ति ध्येयसंस्थितिम्।
तेषां कृपा सुहृत्त्वं च,तमोऽपि नाशयति धृतिम्॥ 

तस्माद् देवेन सह चर,विश्वासं पालय दृढम्।
यः तिष्ठति हरौ नित्यं,स लभेत शाश्वतं सुखम्॥
जीवस्वभावलक्षणम्
यत्र देशे गच्छति जीवः तत्र फलम् अश्नाति।
यत्र देशे वसति स जीवः तद्-देशीयः भवति॥ 

यत्र धर्मे जायते जीवः तमेव धर्मम् आचरति।
एष एव स्वभावोऽस्य जीवस्य नित्यः प्रकीर्तितः॥ 

देशधर्मानुसारं हि चित्तं तस्य प्रवर्तते।
संस्कारैः नियतः जीवः स्वभावेनैव वर्तते॥
स्वभावदोषविचिन्तनम्।
मनसा निश्चितं तादृशानि कर्माणि न करिष्यामि पुनः सदा।
स्वभावात् क्रियते कर्म, मम दोषोऽस्ति कुत्र सदा?
जीवस्वभावदोषः
(मुक्तछन्दः)
जीवः सहजं न इच्छति श्रोतुं सत्यधर्मम्।
जीवने सुखस्याशया करोति धर्मकर्मम्॥

यत्र जातो जीवोऽयं तदेव जगदिच्छति।
तत्रैव मोहान्नित्यं स्वजीवनमवस्थापयति॥

सर्वैरेव पीडितोऽस्मीति मन्यतेऽज्ञानविह्वलः।
परान् सर्वान् विरोधिनः पश्यत्यन्धोऽविवेकबलात्॥

न जानाति पूर्वकर्म स्वजीवनविनिर्मितम्।
न वेत्ति दैवनीतिं तु सर्वलोकनियामिनीम्॥

बान्धवान् स्वजनांश्चैव सर्वस्वमिति मन्यते।
मायाजालेन बद्धः सन् तत्रैव हि निमज्जति॥

विस्मृत्य दिव्यसंदेशं योजनाः कुरुतेऽनिशम्।
संसारार्थे निमग्नोऽयं न पश्यति परं पदम्॥

एष दोषो महान् जीवस्य भ्रमकारकः।
विस्मरत्यात्मनः कर्म सर्वबन्धविनाशकम्॥
न तुलनम् कदाचन
(मुक्तछन्दः)

न हि द्वौ जीवौ समरूपौ कदाचन,
न हि द्वे जीवने समरूपे कदाचन॥

न हि मार्गौ द्वौ समानौ कदाचन,
स्वमार्गे गच्छति जनः प्रतिदिनम्॥

भिन्नाः कथाः सुखदुःखसमन्विताः,
न कदापि ताः भवन्ति समरूपाः॥

केचित् शनैः यान्ति, केचित् च शीघ्रम्,
भिन्नजीवाः दर्शयन्ति स्ववैभवम्॥

स्वकाले प्रस्फुरति जीवः स्वरूपम्,
शान्तचित्तः स्वगीतं गायति स्वयम्॥

मा तुलय, मा विषीद कदाचन,
स्वजीवनं वहति दैवात् सुस्थितम्॥
तृष्णादोषः (तुलना-इच्छा-संबन्धः)
(मुक्तछन्दः)

परद्रव्ये दृष्टिपाते, जायते तृष्णा मनसि।
तुलनाया प्रवाहेण, नश्यति शान्तिः मनसि॥ 

अन्येषां वैभवं दृष्ट्वा, वर्धते कामना दृढा।
स्वसन्तोषं परित्यज्य, धावति चित्तं दृढा॥

तुलना दुःखहेतुः स्यात्, तृष्णा दुःखस्य कारणम्।
एतयोः सङ्गमेनैव, भवति क्लेशकारणम्॥

यः त्यजेत् तुलनां लोके, सन्तोषं धारयेत् हृदि।
तस्य नश्यति तृष्णैव, शान्तिः वसति हृदि॥ 
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जीव-स्वभावः धर्मः।
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
स्वभावदोषो जीवस्य महाऽहितकरश्च महाऽमङ्गलम्।

तस्य प्रतिकाराय जीवस्य स्वभावपरिवर्तनं प्रयोजनम्।
तस्मात् सत्सङ्गः सद्गुरुसङ्गश्च परमं प्रयोजनम्।

स्वभावपरिवर्तनं विना सर्वे कर्मधर्माः निष्फलाः।
एवं देवतासङ्गः सत्सङ्गश्च स्वभावदोषेण विफलाः।
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श्रीजगन्नाथलीलामृतम्

श्री जगन्नाथः धरातले अवतीर्णः मायया मनुष्यरूपेण।

धर्मार्थं रक्षणाय तस्यांशावतारैः सहितः क्वचित् अवतीर्णः।


ब्रह्मादिदेवगणाः मनुष्याश्च तम् ज्ञातुं न समर्थाः;

केवलं तस्य भक्तास्तस्यैवानुग्रहेण तमवगन्तुं समर्थाः।


एवमेव श्रीजगन्नाथस्य लीला युगे युगे प्रवर्तते;

एवमेव सः भूभारं हरति धर्मशिक्षां च संस्थापयते।


श्रीजगन्नाथः परमेश्वरः, यस्मिन् परमज्ञानं नित्यं प्रकाशते।

तस्मिन् न कदाप्यधर्मो वर्धते, धर्मः सत्यं च नित्यं विराजते॥

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वेदेषु कर्मकाण्डानि शरीराङ्गवदङ्गभूतानि,

सर्वेषामपि तेषां मध्यमस्यान्तःस्थितं मर्मात्मज्ञानम्।

यन् मोक्षमार्गद्वारमवगमयति, स्वरूपप्रकाशकमेव,

तस्याभावे यज्ञदानतपःकर्माणि श्रमेणापि कुर्वतः

 निष्फलानि भवन्ति,

यथा बीजहीनं क्षेत्रं फलसमृद्धये अशक्तमेव तिष्ठति॥

वेदान्तमर्मनिर्णयः 

वेदेषु कर्मकाण्डानि शरीराङ्गवदङ्गिनः।

तेषामन्तः स्थितं मर्मात्मज्ञानं प्रकीर्तितम्॥


यन्मोक्षद्वारमुद्घाट्य स्वरूपं प्रकाशयेत्।

तस्याभावे क्रियाः सर्वा यथा क्षेत्रं निरङ्कुरम्॥

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षड्रिपुसंयमः

कामः क्रोधो लोभो मोहः मदो मत्सर एव च ।

एषां संयम एव ह्यात्मसंयम उच्यते ॥


एष आत्मसंयमः प्रोक्तो गीता–उपनिषदोः शुभः ।

चित्तशुद्धिश्च नामास्य आत्मविजय इति स्मृतः ॥

वेद 

वेदों का अमृत-ज्ञान है गहरा,

मानव के पथ को करता ये सवेरा।

ऋषियों के तप, उनकी साधना महान,

वैदिक मंत्रों में बसी सृष्टि की पहचान।


ऋग्वेद में गूंजे सृष्टि का राग,

यजुर्वेद सिखाए कर्म का सुहाग।

सामवेद में संगीतमय मधुरता,

और अथर्ववेद में जीवन की सुरक्षा।


प्रकृति संग जो जीवन का समन्वय सिखाए,

सच्चे अर्थों में समृद्धि का मार्ग दिखाए।

सर्वे भवन्तु सुखिनः का सार,

वैदिक ऋचाओं में बसा सारा संसार।

जीवस्य मनसः वचनम्

(जीवमनःकथा)

मुक्तछन्द

अहं जीवो भ्रमन् लोके कर्ममार्गेण चालितः।

न मे जातिर्न मे धर्मो न कुलं नापि निश्चितम्॥


जन्मजन्मान्तरं याति कर्मवायुवशानुगः।

नानारूपधरो जीवो नान्तमस्य गतौ लभेत्॥


कदाचित् मानवो भूत्वा नभः पश्यामि विस्मितः।

कदाचित् पशुरूपेण वृत्त्या तिष्ठामि वञ्चितः॥


पुनर्मानुषतां याति कालचक्रप्रवर्तितः।

नानारूपाणि धारयन् संसारार्णवे वर्तते॥


देशाद् देशं प्रव्रजामि न कश्चित् मे स्थिरं गृहम्।

अयं विश्वपथो दीर्घो न कदापि मम स्वगृहम्॥


कथं ब्रूयामहं गर्वात् “अयं धर्मो ममैकतः”?

यदा जीवाः सहस्रेषु पन्थान् यान्ति नानातः॥


यावत् सत्यं न पश्यामि जन्मबन्धविवर्जितम्।

न मे जातिर्न मे धर्मो न देशो न सुहृदः मम॥

कालधर्मः

सृष्टि-स्थिति-प्रलयः भवति नित्यं,

इत्यस्य संसारचक्रस्य नियमः।

ब्रह्मा सृष्टिं करोति नित्यम्,

विष्णुः पालयते जगतः सुखम्।

कालः प्रलयं करोति च नित्यम्,

इत्यस्य संसारचक्रस्य नियमः।

कालचक्रम्-समयचक्रम्

(मुक्तछन्दः)


न कश्चिद् लभते सिद्धिं कालेन विना क्वचित्,

न कश्चिद् वर्धते लोके कालेन विना क्वचित्॥ 


काले बीजं प्रसूयते, काले पुष्पं प्ररोहति,

काले फलमवाप्नोति, काले सर्वं प्रवर्धते॥


केचित् शीघ्रं प्रकाशन्ते, केचित् शनैः प्रवर्धन्ते,

न कालः कञ्चन बाधते, स्वमार्गेणैव प्रवर्तते॥


यदा समयः समायाति, तदा भाग्यं प्रबुध्यते,

अकाले कृतमप्यर्थं निष्फलं सम्प्रपद्यते॥ ४॥


मा धाव, मा विषीद त्वं, कालं प्रतीक्षस्व धीरवत्,

स्वकाले सिद्धिमायान्ति धैर्ययुक्ताः सर्वजीवाः॥


जीवस्य अन्त्यप्रार्थना

(मुक्त छन्द)

मम शक्तिरियं क्षीणा, आशाप्यन्ते समाप्ता।

अन्ते सर्वं विनष्टं मे, नाथ त्वां शरणागतः॥


जन्मऋणं समाप्याहं त्वामहं ह्वये नाथम्।

कोले गृहाण मां दीनं, त्वं करुणामयः प्रभो॥


अस्मिन् लोके न कोऽप्यस्ति सत्यस्नेहपरायणः।

न कश्चिदिह जानाति प्रेम्णो मार्गमनन्तकम्॥


यत्र शुद्धः स्नेहभावो नित्यं मधुरसञ्चितः।

तत्र गन्तुमिहेच्छामि, नाथ त्वां शरणागतः॥


बहुदग्धोऽस्मि दुःखेन, कामजालात् विमुक्तः।

वैराग्येण दग्धचित्तः सर्वसङ्गविवर्जितः॥


बहु रुदितवान् पूर्वं, न शक्नोम्यद्य रोधनम्।

भिन्नहृदयोऽहमेकाकी, नाथ त्वां शरणागतः॥

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ईश्वरस्य समीपे जीवप्रार्थना ।
(मुक्तछन्दः)
शक्तिप्रार्थना:

इत्थं शक्तिं प्रदेहि श्रीनाथ,
मा नः श्रद्धा क्षणमपि क्षीयताम्।
सत्पथे नय जीवनपन्थानं,
मा नः स्खलनं भवतु किञ्चन॥

 ज्ञानप्रार्थना:
अज्ञानतिमिरं पूर्णं नाशय,
ज्ञानदीपप्रभया विभासय।
पापमार्गात् सदा रक्ष नः,
कल्याणीं जीवनविधिं प्रयच्छ॥

 सद्भावप्रार्थना:
नास्तु वैरं कस्यचिदपि,
नास्तु प्रतिशोधभावना मनसि।
न चिन्तयेम वयं स्वलाभकम्,
सदा स्मरामः कृतमर्पणम्॥

 करुणाप्रार्थना:
आनन्दपुष्पाणि वयं वितराम,
सर्वेषां जीवनमेतु मधुवनम्।
करुणाजलधारया जगन्नाथ,
पावय सर्वं मनसः कोणकम्॥

लोकदुःखनिवारणप्रार्थना:

दुःखमयं सर्वतोऽयं जगत्,
त्रस्तमानसो जनः कम्पितः।
पापभारो वर्धते नित्यशः,
कथं धरा धृतवती प्रभो॥

ममताप्रार्थना:
ममतया भगवन् भारमेतं
उद्धर त्वं करुणासिन्धो।
मा लुप्यतां तव सृष्टिरियम्,
शान्तिर्लोके भवतु स्थिरा॥

आत्मशुद्धिप्रार्थना :

स्वकृतं फलमश्नुयाम वयं,
मृत्योरपि नः भयं मा अस्तु।
अतीतदुःखं न पुनर्भवेत्,
भविष्यत् कल्याणमयं कुरु नाथ॥

अन्तिम ध्रुवपदः
इत्थं शक्तिं प्रदेहि श्रीनाथ,
मा नः श्रद्धा क्षणमपि क्षीयताम्।
सत्पथे नय जीवनपन्थानं,
मा नः स्खलनं भवतु किञ्चन॥

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गृहस्थवैष्णवानां कृते शान्तिमन्त्रः

॥ शान्तिः–मन्त्रः ॥


हे प्रभो वयं हि गृहिणो वैष्णवभावनान्विताः,

त्वां भक्त्या प्रतिपद्येम प्रेम्णा रहितजीविताः।

त्वद्भक्तिविरहः साक्षात् दुःसहः स्यात् त्वयि विना ।

त्वं नाथः परमैकः स्यान्, नान्यः दयालुभिः विना ॥


देव त्वं कुटुम्बमस्माकं मित्राण्यपि च पालय,

सर्वान् भक्तजनान् नित्यं स्वकृपावृष्टिभिः सदा।

विश्वासे दृढतां देहि शुद्धेनान्तःकरणेन,

शान्तिं देहि जनानां च भूयाद् शान्तिः सनातनम्॥


ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

💗

नित्यं पुण्यभूमिं भारतम्

नित्यं पुण्यभूमिं भारतं दिव्यम्,

भगवान् अवतीर्यते भक्तसहितम्।

पवित्रपादरजःसिक्तधर्मधारा,

विश्वं प्रकाशति दीपः पुण्यप्रसारा॥


हरिहृदये श्रद्धा गभीरनभोमती,

धर्मः स्थिरः, वेदध्वनिं शृणोति।

ऋषिसन्तः पदचिह्नधूलिपूज्यं,

नित्यं पुण्यभूमिं भारतं शरणम्॥


गङ्गातरङ्गहिमालयशिखरस्थं,

भक्तिगीतं भवतु नित्यं भारतम्॥


धर्मदीपेन विराजति भारतं,

कालपरिवर्तनेऽपि नित्यं ध्रुवम्।

देशकालजात्यतीतं महत् सत्यं,

नित्यं पुण्यभूमिं भजत भारतं॥

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सनातनभूमिः भारतम्

भारतं पुण्यभूमिरेषा शाश्वती पावनात्मिका।

यत्रावताराः सम्भवन्ति देवैः सह महात्मभिः॥


पादधूलिविशुद्धायां धर्मधारा प्रवर्तते।

सत्यदीपप्रकाशेन विश्वमेव प्रकाशितम्॥


श्रद्धा हृदि निवसति गगनस्येव निश्चला।

कालचक्रे प्रवर्तन्ते सद्गुणा न कदाचन चलाः॥


यत्र सन्तो मुनिश्रेष्ठाः सत्यनिष्ठाः विचेरिरे।

सा भूमिः भारतं नाम कृपादैवतनिकेतनम्॥


गङ्गातरङ्गमालासु हिमवद्गिरिशृङ्गके।

वसति ब्रह्मतत्तत्त्वं वेदनादप्रबोधकम्॥


रामचापप्रभा यत्र कृष्णवेणुरवामृतम्।

भक्तिगीतरवैः पूर्णं जगदेतत् निरन्तरम्॥


कालपरिवर्तनेऽप्येषा न भिद्यते न हीयते।

धर्मज्योतिः समुत्थाय विश्वमार्गं प्रदर्शयेत्॥


न देशकालनिबद्धोऽयं न जातिधर्मसंश्रयः।

सन्देशोऽयं सनातनः सत्यसेवाप्रबोधकः॥


सर्वभूतेषु देवत्वं पश्यन् धर्मे स्थितो भव।

एष भारतसन्देशः मोक्षमार्गप्रदर्शकः॥

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छद्म-धर्म 


धर्मं वदन्ति, कुहरन्ति हृद्ये, सन्तेषु वेषं वहन्ति सदैव।

वाचि पवित्रं, मनसि विषं तु, गूढं प्रच्छन्नं निहितं विचित्रम्॥


पापानि “ईशेच्छा” नाम्ना च, दुष्कृत्यं दिव्यं विदधन्ति ये।

प्रत्येकपापं पुरतः पश्चात्, “ईश्वरः स्वयम् आज्ञापयति” इति॥


मोहाहंकारान्धा सत्यनास्तिकाः, छायां भजन्ति प्रमाणत्यागिनः।

स्वर्गप्रभामिव तं प्रकाशं मत्वा, अन्धकार-पटलं विदुः गहनम्॥


न धर्मिणः ते, दम्भ-मोहिताः, लोभ-मदेन प्रेरिताः ये।

पुण्यं क्षीयते, गुणः विनश्यति, मृत्यु-तमोऽरोहति धीमतां हृदि॥


शृणु नियमं हे मन विलसन्, ईश्वरः सत्यसहितः सदा शुद्धः।

यत्र धर्मो भग्नः मिथ्या-राज्ये, तत्र पाप-दुःख-बंधनं चरति निःशब्दम्॥

धर्मदुरुपयोग-धर्मदूषणम्

(मुक्तछन्दः)

यः करोति धर्मेण व्यापारं, तस्य जीवनं केवलं असारम्।

यः करोति धर्मेण दर्पं, स तु अज्ञानी मूर्खसमः॥


यः करोति लोकदर्शनार्थं धर्मं, तस्य धर्मः व्यर्थं कर्म।

यः इच्छति धर्मं नियन्तुं, स अज्ञानी एव मूर्खसमः॥


यः वदति धर्मं केवलं वचनेन, नाचरति कर्मणा किञ्चित्।

तस्य वचनं निरर्थकं ज्ञेयं, शुष्कवृक्षफलमिव निश्चितम्॥


यः धर्मनाम्ना करोति हिंसां, स्वार्थ-सिद्ध्यर्थमेव नित्यं।

स अधर्मी धर्मवेषधारी सन् लोकान् मोहयति-एतदेव सत्यं॥


धर्मो न केवलं शास्त्रं, न च केवलं व्रतपूजनम्।

यत्र भक्तिभावः सत्याचारश्च, स एव धर्मः शाश्वतः॥

धर्मप्रदूषणनिवारणम्

(मिथ्यैश्वरदोषः)

(मुक्तछन्दः)

ब्रह्मणा सृष्टाः जीवाः काले काले निर्मीयन्ते अनेकाः मिथ्यैश्वराः ।

ब्रह्मणं च अंशब्रह्मणं च न जानन्ति, मुखाद् हरिम् ईश्वरं वदन्ति ॥


ब्रह्मणा सृष्टाः एते जीवाः पुनः पुनः कुर्वन्ति धर्मस्य प्रदूषणं ।

भगवान् पूर्णब्रह्म एतत् पापं यथाकालं करोति मूलच्छेदं  ॥

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ब्रह्मणा सृष्टाः जीवाः = ब्रह्मा द्वारा रचे गए जीव।

स्वयमेवेश्वरत्वभ्रमः

(मुक्तछन्दः)

ब्रह्मा रचयति विचित्रान् नरान्,

ये स्वयं वदन्ति “अहं नारायणः”।

न जानन्ति यथावत् ब्रह्मतत्त्वम्,

अज्ञानतः वदन्ति “स्वयमेव परमेश्वरः”॥


दर्शयन्ति शास्त्राणि, वदन्ति सत्यम्,

“अहमेव ईश्वरः, केवलं ममैव सत्यम्”।

वदन्ति “वयं ज्ञानी, वयं भगवान्”,

अन्ये सर्वे नश्वराः, ते अज्ञानिनः॥


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धरातले ईश्वर–अंशावतारयोः परिचयः।
न वदति भगवान् धरातले न भवति अवतीर्णः।
अवतरणात् पूर्वमेव शास्त्रेषु तस्यावतरणकथायाः भवति वर्णनम्।
अपि च तस्य शरीरे दिव्यचिह्नानि सन्ति विराजमानम्।
एतदेव सनातनधर्मे वर्णितम्, युगे युगे प्रतिपादितम्।

धरातले ईश्वर–अंशावतारयोः परिचयः।
न वदति भगवान्, धरातले न भवति अवतीर्णः।
अवतरणात् पूर्वमेव शास्त्रेषु तस्य अवतरणकथायाः भवति वर्णनम्।
अपि च तस्य शरीरे दिव्यचिह्नानि सन्ति विराजमानम्।
एतदेव सनातनधर्मे वर्णितम्, युगे युगे प्रतिपादितम्॥
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भगवदसम्मान-नीतिः
शृणुत भक्तजनाः, एतत् सत्यं सनातनं वचनम्।
भगवतः प्रति कदापि, कस्मिंश्चित् कारणे, न कुर्यात् अनादरवचनं।
एतत् न कदाचित् उचितं, न ग्राह्यं, न श्रवणीयं।
भगवतः प्रति अनादरवचनं सदा वर्जनीयम्॥
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उदाहरणम् -
जगन्नाथ-नाम “जगा” इति संक्षेपतः न उच्चारयेत्;
एतत् सर्वथा वर्जनीयम्।

अति सर्वत्र वर्जयेत्।

(अति-संयमः )

अतिधनं हि चित्तं मदेन नुदति, सत्यपन्थानं न पश्यति ध्रुवम्।

अतिसौन्दर्यमपि स्वयम् अहङ्कारदीपं प्रज्वालयत्यवश्यम्॥


अतिभोजनं देहे भारं विधाय विवेकं मन्दं करोति सततम्।

अतिसुखं प्रमादं प्रसूय धीधैर्यं क्षीणं करोति निरन्तरम्॥


अतिगर्वो हि जीवस्य दृष्टिं सत्यात् पराङ्मुखीं करोति निश्चितम्।

सर्वं स्खलति तदा यदा हृदि राजते दुर्निवारितोऽहङ्कारदर्पम्॥


अतिविद्या–अल्पविद्याभ्यां हृदि जायतेऽहंममतिदर्पः।

सर्वं स्खलति तस्यैव यदा वसति दुर्निवार्योऽहङ्कारदर्पः॥


इति नीतिः सनातनी - हितं सत्‌पथं पन्थानमाचरेत्।

यतो धर्मस्य मूलं हि सदाचारं - अति सर्वत्र वर्जयेत्॥

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राजा च धर्मविषयकं श्लोकत्रयम्

प्रजाभ्यः राजा महान्, राज्ञोऽपि परमो धर्मः।  

यो न जानाति तत् तु, स्यात् स अहंकारी वा मूर्खः॥


यः राजा करोति अधर्मम्, धर्मात्मभ्यः करोति अवहेलाम्।  

स महापापभाग् भवेत्, परजन्मनि प्राप्नोति दुःखयन्त्रणाम्॥


धर्मावरणेन यः करोति वा कारयति अधर्मम्।  

न स भक्तो न च साधुः, स कालनेमिसमः स्मृतः॥

💓

गृहदेवालयनियमः  

सम्पूर्णे गृहे विधिना गृहप्रवेशः शुभप्रदः ।  

असम्पूर्णे न कर्तव्यो कर्मारम्भः कदाचन ॥

  

वास्तुशास्त्रोक्तमुहूर्तं लोकाचारैश्च सम्मतम् ।  

एष सनातनः धर्मः लोकाचारेषु वर्णितः ॥ 

 

सम्पूर्णे देवमन्दिरे देवप्रतिष्ठा विधीयते ।  

नासम्पूर्णे न कार्या प्राणप्रतिष्ठा सिद्धमते ॥ 

 

देवस्थानस्य सिद्धौ तु सर्वकर्म समाचरेत् ।  

एष नित्यः सनातनधर्मस्य नियमः स्मृतः ॥ 

 

वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।  

एतत् चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद् धर्मस्य लक्षणम् ॥

💓

देवालयध्वजारोहणनियमः

(देवालयध्वजारोहणविधिः)

ध्वजारोहणकर्मैतत् सनातनधर्मसंमतम् ।

देवालयस्य शोभार्थं विजयस्य च सूचकम् ॥ 


संस्थापिते च देवेशे नारोहेद् देवमन्दिरम् ।

न सञ्चरेत्ततो भक्तः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ॥


कर्मार्थे यदि गन्तव्यं बहिर्नीत्वा विग्रहम् ।

शुद्धिं कृत्वा विधानेन पुनः स्थापयेत् विग्रहम् ॥


एष धर्मः परो ज्ञेयः शास्त्रसम्मतसंस्थितः ।

मर्यादारक्षणार्थाय सर्वलोकहितस्थितः ॥ 

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ग्रहणतत्त्वविवेचनम्
छायया छन्नः सूर्यो यथा शास्त्रे प्रकीर्तितः ।
न तत्र क्रियाविधिर्दृष्टो ग्रहणे कर्मणां क्वचित् ॥

न भगवद्गीता-शास्त्रे ग्रहणस्य विशेषो विधिरुच्यते ।
प्रकृतेर्गुणचक्रेऽयं भावो ज्ञेयः समाहितैः ॥

स्नानं जपो दानकर्म मन्त्रौच्चारादिकं तथा ।
न वेद-गीतोक्त-आज्ञास्तु स्मार्ताचारप्रवर्तिताः ॥

समत्वबुद्ध्या कर्तव्यं न भयेन कदाचन ।
प्रकृत्याः क्रियमाणोऽयं नियमो दैवसंश्रितः ॥

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पीठनिर्माणसिद्धिः

(पीठनिर्माणविधिः)

शास्त्राधारे पवित्रे भूमौ विधिपूर्वं प्रतिष्ठितम् ।

अधिकारिगुरुणा सार्धं परम्परया सुपोषितम् ॥ 


नित्यआराधनसंयुक्तं सदाचारसमन्वितम् ।

लोकसंग्रहकार्येण शिष्यपरम्परान्वितम् ॥ 


न केवलं क्रियामात्रात् पीठं सिद्धिमवाप्नुयात् ।

तपोधर्मसमायुक्तं सत्येनैव विराजयेत् ॥

ब्रह्मग्रन्थिः-उपवीतं यज्ञोपवीतम्

(मुक्तछन्दः)

द्विजाः संधारयन्ति ब्रह्मग्रन्थिमुपवीतरूपं ब्रह्मसूत्रम्।

न तत्र ब्रह्मांशः, कथं तद्भवेत् ब्रह्मसूत्रम्?॥

यत्र ब्रह्मग्रन्थिरस्ति, न तु ब्रह्मांशोऽप्यिति धर्ममतम्।

शास्त्रज्ञा गुरवो ब्रुवन्त्वेतत्-किमेतत् धर्मसम्मतम्?॥

ब्रह्मग्रन्थिः-उपवीतं यज्ञोपवीतम्

(मुक्तछन्दः)

द्विजाः संधारयन्ति ब्रह्मग्रन्थिम् उपवीतरूपं ब्रह्मसूत्रम्।  

न तत्र ब्रह्मांशः, कथं तद् भवेत् ब्रह्मसूत्रम्?॥

यत्र ब्रह्मग्रन्थिः अस्ति, न तु ब्रह्मांशोऽपि-इति धर्ममतम्।  

शास्त्रज्ञा गुरवो ब्रुवन्तु एतत्-किम् एतत् धर्मसम्मतम्?॥

💓

प्रणामाशिषो नियमः
यः साष्टाङ्गं प्रणमति भक्त्या विनयान्वितः ।
तस्मै दातव्यमाशीर्वादं हृदयेन विशुद्धया ॥

यस्य शक्तिर्वर्तते तु आशीर्वादप्रदायने ।
स प्रयत्नेन दद्यात् तत् धर्ममार्गानुसारतः ॥

यदि शक्तिविहीनोऽपि दातुं न शक्नुयाद् जनः ।
तदा तत्प्रणतिं देवे समर्प्य प्रणतो भवेत् ॥

तस्य क्षेमं च कल्याणं प्रार्थयेत् श्रीहरिं प्रति ।
एष धर्मः सनातनः शाश्वतो नियमो ध्रुवः ॥

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