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यज्ञोपवीत- ब्रह्मग्रन्थि- उत्कल ब्राह्मण।

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यज्ञोपवीतवर्णनम् यज्ञोपवीतं त्रिसूत्रात्मकं शुभम्। प्रत्येकसूत्रं त्रितन्तुमयं स्मृतम्॥ नवतन्तुसमायुतम् एवं परमपवित्रम्। ब्रह्मग्रन्थियुक्तं हि यज्ञोपवीतम्॥ यज्ञोपवीत की ग्रन्थि को “ब्रह्मग्रन्थि” कहा जाता है। ब्रह्मग्रन्थि शब्द दो पदों से बना है - ब्रह्म + ग्रन्थि। इस प्रकार ब्रह्मग्रन्थि का शाब्दिक अर्थ हुआ -“ब्रह्म से सम्बन्धित पवित्र गाँठ।  सनातन धर्मशास्त्र के अनुसार ब्रह्म के चार रूप हैं-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध। इन्हें एक साथ “चतुर्व्यूह-रूप” कहा जाता है। इस तत्त्व का उल्लेख श्रीमद्भागवतपुराण, विष्णुपुराण तथा पाञ्चरात्र आगम में मिलता है । [ पाञ्चरात्र आगम किसी एक लेखक की रचना नहीं है; यह भगवान नारायण से प्रकट आगमिक परम्परा है। भगवान् नारायण ने इस तत्त्वज्ञान का उपदेश पाँच रात्रियों में प्रदान किया; अतः इस आगमिक परम्परा को “पाञ्चरात्र ” कहा जाता है। आगम = परम्परागत दिव्य शास्त्र। ] चतुर्व्यूह-तत्त्व के अनुसार:- भगवान श्री वासुदेव (Vasudeva) – परमब्रह्म का मूल प्रकट स्वरूप; शुद्ध चेतना। श्री संकर्षण/श्री बलराम (Saṅkarṣaṇa) – ज्ञान तथा अहंकार-तत्त्व से संबद्ध...